वैदिक गणित की नियम, विशेषतायें एवं तीन का नियम (क्रम त्रैराशिकऔर व्यस्त त्रैराशिक नियम नियम)
वैदिक गणित का सामान्य परिचय
गणितशास्त्र भारत के प्राचीनतम शास्त्रों में से एक है। गणित शास्त्र का प्रयोग सार्वभौमिक और सार्वकालिक है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार प्राचीन काल में गणित के पर्यायवाची थे-1. गणना 2. संख्यान तथा 3. संख्याशास्त्र, किन्तु शास्त्र का नाम प्रायः गणित ही रहा है। सभ्य समाज से लेकर अनपढ़ समाज तक सभी अपने-अपने ढंग से कामकाज चलाने के लिए गणित का प्रयोग करते हैं। उपलब्ध साहित्य अर्थात् वैदिक साहित्य में गणित के ज्ञान का पर्याप्त परिचय मिलता है।
वेदों से वैदिक गणित का उद्गम हुआ है। 'वेद' का शाब्दिक अर्थ है-सम्पूर्ण ज्ञान का उद्गम स्रोत और असीमित भण्डार। यज्ञ वेदों का मुख्य विषय रहा है। यज्ञ के लिए वेदियों बनती थीं। यज्ञकाल की सिद्धि के लिए ज्योतिष सम्बन्धी गणना, गति, स्थिति आदि की आवश्यकता पडती थी। परम आदिकाल से ही तारों के अवलोकन से नानाविध अनुमान लगाये जाते थे। मनुष्य मात्र के आविर्भाव से ही ज्योतिष्क कार्यों का अवलोकन प्रारम्भ हो गया था, लेकिन खगोलगणित (Mathematical Astronomy) का विकास तभी हो पाया होगा जब मनुष्य जाति परिकलन (Calculation) में काफी आगे बढ़ चुकी होगी, इसलिए ज्यामिति (Geometry) और खगोलगणित (Astronomy) का अध्ययन आवश्यक था। अतः ऐसा माना जाता है कि भारतीय परम्परा में गणित, नाट्यशास्त्र आदि का स्रोत यज्ञ रहा है।
वैदिक गणित 16 सूत्रों तथा 13 उपसूत्रों का संग्रह है, जो वेदों से लिया गया है और जिसकी खोज जगद्गुरू स्वामी भारतीकृष्णतीर्थ जी महाराज ने की है। यद्यपि ये सभी 16 सूत्र वेदों में साक्षात्रूप से नहीं मिलते, लेकिन स्वामी जी ने वेदों और उपनिषदों की गहन खोज के बाद इन्हें अपने वैदिक गणित नामक ग्रन्थ में एकत्र पुनः प्रतिपादित किया है। सभी 16 सूत्र गणित के विभिन्न विषयों से जुड़े हुए हैं। एक वाक्य के मुहावरों; जैसे ये सूत्र आसानी से समझे और याद किये जा सकते हैं।
वैदिक गणित में 16 सूत्र तथा 13 उपसूत्र निम्नलिखित हैं-
1. एकाधिकेन पूर्वेण
2. निखिलम् नवतश्चरमं दशतः
3. ऊर्ध्वतिर्यग्भ्याम्
4. परास्त्वं योजयेत
5. शून्यं साम्यसमुच्चये
6. (आनुरूप्ये) शून्यमन्यत्
8. पूरणापूरणाभ्याम्
9. चलनकलनाभ्याम्
10. यावदूनम्
11. व्यष्टिसमष्टिः
12. शेषाण्यंकेन चरमेण
13. सोपान्त्यद्वयमन्त्यम्
14. एकन्यूनेन पूर्वेण
15. गुणितसमुच्चयः
16. गुणकसमुच्चयः
इसके अतिरिक्त वैदिक गणित में 13 उपसूत्र भी हैं-
1. आनुरूप्येण
2. शिष्यते शेषसंडाः
3. आद्यमाद्येनान्त्यमन्त्येन
4. केवलैः सप्तकं गुण्यात्
5. वेष्टनम्
6. यावदूनं तावदूनम्
7. यावदूनं तावदूनीकृत्य वर्गं च योजयेत्
8. अन्त्ययोर्दशकेऽपि
9. अन्त्ययोरेव
10. समुच्चयगुणितः
11. लोपनस्थापनाभ्याम्
12. विलोकनम्
13. गुणितसमुच्चयः / समुच्चयगुणितः
वैदिक गणित के इन सूत्रों की सहायता से अंकगणित से बीजगणित और ज्यामिति से कलन तथा त्रिकोणमिति तक के सवालों को हल किया जा सकता है। इनके अतिरिक्त वैदिक गणित, 'निर्देशांक ज्यामिति' में भी उतनी ही सफलता से काम करता है अर्थात् गणित का कोई भी ऐसा पहलू नहीं है, चाहे शुद्ध हो या व्यावहारिक, जो इसकी सीमा से परे है। 1958 ई० में कैलिफॉर्निया के पेसिडिना में इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में दिये गये एक संबोधन में स्वामी भारतीकृष्णतीर्थ जी महाराज ने कहा- "जिन लोगों को वैदिक गणित के सूत्रों के व्यावहारिक प्रयोग की जानकारी है, उन्हें इनके सैद्धान्तिक पक्ष को समझने की जरूरत नहीं पड़ती ।"
स्थानांग सूत्र (350 ई०पू०) के 716 वें सूत्र में गणित को अतिसूक्ष्म विषय बताया गया है। इस सूत्र की व्याख्या करते हुए टीकाकार ने कहा है कि गणित वज्र के समान अत्यन्त कठिन है-
"गणितं सूक्ष्मगणितं संकलनादि तदैव सूक्ष्मम्। सूक्ष्मबुद्धिगम्यत्यात्, सूक्ष्मबुद्धिगम्यत्वात्, श्रूयते श्रूयते च च यज्ञान्तं वज्रान्तं गणितमिति ||"
इसलिए छात्रों में दिन-प्रतिदिन गणित के प्रति रुचि घटती जा रही है, जो कि एक बेहद चिंता का विषय है; क्योंकि इससे देश की प्रगति में भी बाधा उत्पन्न होगी। ऐसे समय में स्वामी भारतीकृष्णतीर्थ जी महाराज का 'वैदिक गणित' नामक ग्रन्थ छात्रों के लिए एक वरदान के समान है, जो न केवल उनमें गणित के प्रति रुचि जगाता है; अपितु उनके आत्मविश्वास को भी बढ़ाता है। यह ग्रन्थ स्वामी जी के वेदों के आत्मसात् करने और उनकी अनेक वर्षों की तपस्या का फल है, यह इस ग्रन्थ की विशेषताओं से स्वयमेव सिद्ध हो जाता है।
वैदिक गणित की विशेषतायें
1. प्राचीन विधि-यह भारतीय प्राचीन पद्धति है तथा पूर्णतया गैर-पारम्परिक और आसान है; जिस कारण छात्रों का आकर्षण इसकी ओर स्वाभाविक रूप से हो जाता है।
2. मनोरंजक विधि-इस विधि से गणित के विभिन्न विषयों के टेढ़े-मेढ़े और उलझाऊ सवालों को हल करने में मदद मिलती है। पारम्परिक, शुष्क और उबाऊ गणित को खेल ही खेल में और दिलचस्प तरीकों से सिखाने वाली यह एक मनोरंजक विधि है जिसकी ओर आकर्षण होना अवश्यम्भावी है।
3. समय की बचत : यह विधि पारम्परिक विधि की तुलना में 10 गुना तेज है। हल होने में बहुत अधिक समय लेने वाले कठिन से कठिन सवालों को भी इस विधि का सहयोग लेकर, मन ही मन में हल किया जा सकता है तथा कुछ ही सेकंड में उसका मौखिक उत्तर दिया जा सकता है, जिससे समय की बचत होती है। यहाँ तक ही नहीं, अपितु इस विधि में सवाल को हल करने के साथ-साथ, उसके उत्तर की सटीकता को भी कुछ सेकंड में जाँचा जा सकता है।
4. संसाधनों की बचत: इस विधि का प्रयोग करके कठिन सवालों को आसानी से कम समय में बिना किसी कागज और कलम आदि संसाधनों के, मन ही मन में हल किया जा सकता है, जिससे इन संसाधनों की आवश्यकता नहीं पड़ती, और इस प्रकार इन संसाधनों की बचत भी हो जाती है।
5. बहुवैकल्पिक प्रणाली: इस विधि में बहुविकल्पों की प्रधानता है; उदाहरण के तौर पर, गणित की पारम्परिक विधि में गुणन की 'गौमूत्रिका' नामक मात्र एक विधि प्रचलित है जबकि इसके लिए वैदिक गणित में 'ऊर्धव-तिर्यक् विधि', 'निखिलं विधि' तथा 'विचलन विधि आदि कई विधियाँ प्रचलित हैं। केवल गुणन के लिए ही नहीं, अपितु जोड़, घटाव, भाग आदि के लिए भी वैदिक गणित में अनेक विधियाँ प्रचलित हैं। चूंकि इस विधि में अनेक विकल्प होते हैं इसलिए छात्र को किसी भी सवाल को हल करने के लिए अपनी स्वतंत्रता से विधि चुनने का अवसर होता है।
6. पर्यावरण-संरक्षण- गणित में वैदिक विधि के प्रयोग से पर्यावरण संरक्षण भी होता है। वैदिक विधि में बिना किसी कागज और कलम के, मन ही मन में और कुछ ही सेकंड में उत्तर दिया जा सकता है, इसलिए वहाँ कलम, कागज आदि की आवश्यकता नहीं पड़ती। कागज बनाने के लिए कई वृक्ष काटने पड़ते हैं। वृक्ष पर्यावरण का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अङ्ग माने जाते हैं, इसलिए वैदिक विधि में कागज आदि की आवश्यकता न होने के कारण वृक्ष नहीं काटने पड़ते और इस प्रकार पर्यावरण की रक्षा हो जाती है।
7. व्यक्ति का सर्वाङ्गीण विकास-पारम्परिक विधि की उबाऊ तथा अधिक समय लेने वाली पद्धति ने लोगों को कैलकुलेटर तथा कम्प्यूटर आदि उपकरणों की आदत डाल दी है जिस कारण हमारा मस्तिष्क कमजोर होता जा रहा है। मस्तिष्क का निरंतर प्रयोग करने से या श्रम करने से वह स्वस्थ और दुरुस्त बना रहता है, इसलिए वैदिक विधि के प्रयोग से मानव का मस्तिष्क दुरुस्त बना रहता है। इस विधि के प्रयोग से लोगों के अन्दर गणित का भय भाग जाता है, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता है तथा इससे व्यक्ति का सर्वाङ्गीण विकास हो पाता है।
8. तकनीकी क्षेत्र में योगदान-वैदिक गणित सॉफ्टवेयर विकसित करने वालों लोगों के लिए कोडिंग और प्रोग्रामिंग में भी उपयोगी सिद्ध हो रहा है। ऐसा भी कहा जाता है कि नासा के वैज्ञानिकों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में इसके सिद्धान्तों का प्रयोग किया है। यहाँ तक कि आई०आई०टी० (IIT) के छात्र भी इस प्राचीन विधि का प्रयोग तेजी से गणना के लिए कर रहे हैं। इसलिए वैदिक गणित का उपयोग केवल गणित सम्बन्धी सवालों को हल करने के लिए ही नहीं है, अपितु तकनीक के क्षेत्र में भी यह अत्यन्त उपयोगी है।
9. प्रतियोगी परीक्षाओं में सहायक: वैदिक गणित विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने वाले छात्रों के लिए एक सशक्त शस्त्र बन गया है क्योंकि इसका प्रयोग करके छात्र परीक्षाओं में सटीकता के साथ कम से कम समय में उत्तर देने में समर्थ होते हैं।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि वैदिक गणित की उपरोक्त विशेषताओं के कारण इसकी शिक्षा भारत में ही नहीं, अपितु इंग्लैंड और अमेरिका के प्रसिद्ध संस्थानों में भी दी जा रही है। छात्र, प्रतियोगी, इंजीनियर, शिक्षक, व्यापारी सभी वर्ग के लोग इसका लाभ उठा रहे हैं। यही कारण है कि वैदिक गणित को सार्वकालिक और सार्वभौमिक माना जाता है।
तीन का नियम या त्रैराशिक नियम
गणित से सम्बन्धित त्रैराशिक नियम की अवधारणा यजुर्वेद, वेदाङ्गज्योतिष आदि ग्रन्थों में प्राप्त होती है। इस नियम के अनुसार त्रैराशिक में तीन राशियाँ- 'प्रमाण', 'फल' और 'इच्छा' ज्ञात होती हैं और चौथी राशि अज्ञात होती है जिसका मान निकाला जाता है।
वेदाङ्ग ज्योतिष में त्रैराशिक नियम इस प्रकार आया है-
"इत्युपायसमुद्देशो भूयोऽप्येवं प्रकल्पयेत् ।
ज्ञेयराशिं गताभ्यस्तं विभजेज् ज्ञातराशिना ||"
(याजुष ज्योतिष, पद्य 42)
अर्थात् उपाय समुद्देश (युग, वर्ष, अयन, ऋतु, मास, अधिमास, पक्ष, तिथि, नक्षत्र, पर्वकाल इत्यादि का निरूपण) को वस्तुस्थिति के अनुकूल रूप में तथा रीति से कल्पित करना चाहिए। ज्ञातराशि द्वारा गुणित ज्ञेयमूलराशि को ज्ञानसाधनरूपी ज्ञातराशि से विभाजित करना चाहिए। कहने का अभिप्राय है कि इच्छित फल को प्राप्त कराने वाला यह त्रैराशिक नियम है, जो लोक व्यवहार में प्रतिदिन काम आता है। इस नियम का प्रयोग इस प्रकार है-
कार्यों में इच्छित फलों को प्राप्त करने के लिए, पहले ज्ञात इच्छित फल को लीजिए, इसको प्रमाण फल से गुणा कीजिए, फिर इसको उस प्रमाण राशि से भाग दीजिए जिसका फल दे रखा है।
इस नियम में चार राशियाँ अनुपात में है, जिनमें से तीन ज्ञात हैं और एक अज्ञात है। इनमें चौथी अज्ञात राशि, (ज्ञात) तीन राशियों से ज्ञात होती है, इसलिए इसको त्रैराशिक या तीन का नियम कहा जाता है।
पहली दो राशियाँ ज्ञात राशियाँ कहलाती हैं, बाकी दो राशियाँ ज्ञेय कहलाती हैं। यह बहुत ही आसान नियम है जो सर्वसुलभ है। कहने का अभिप्राय है कि त्रैराशिक के प्रश्नों में फलराशि को इच्छाराशि से गुणा करना चाहिए और प्राप्त गुणनफल को प्रमाण राशि से भाग देना चाहिए। इस प्रकार भाग करने से जो लब्धि प्राप्त हो, वही इच्छाफल है।
इस सन्दर्भ में आर्यभट्ट द्वितीय का कथन है कि पहली राशि को मान कहते हैं, मध्य राशि को विनिमय कहते हैं और अन्तिम राशि को इच्छा कहते हैं। पहली और अन्तिम राशियाँ एक जाति की होती हैं। मध्य राशि को अन्तिम राशि से गुणा करके गुणनफल को पहली राशि से भाग देने पर इच्छा फल मिलता है-
आद्यो राशिर्मानं विनिमयसंज्ञो भवेन्मध्यः ।
इच्छासंज्ञोऽन्त्यः स्यादाद्यान्तावेकजातीया ||
महासिद्धान्त, 15-24
इस नियम के विषय में ब्रह्मगुप्त का कथन है कि त्रैराशिक में प्रमाण, फल और इच्छा नाम की तीन राशियाँ होती हैं, जिनमें पहली और अंतिम राशियाँ एक जाति की होती है। इच्छा को फल से गुणा करने पर और उस गुणनफल को प्रमाण से भाग देने पर इच्छा फल मिलता है-
त्रैराशिके प्रमाणफलमिछाद्यं तयोः सदृशराशिः।
इच्छाफलेन गुणिता प्रमाणाभक्ताफलं भवति ||
ब्रह्मसिद्धान्त, 12-101
अल्बेरुनी (973-1048 ई०) ने त्रैराशिक नियम पर एक पुस्तक लिखी है जिसका नाम है-फी राशिकात अलहिंद। भारत से यह नियम अरब पहुँचा और वहाँ से यूरोप में प्रसारित हुआ। आर्यभट्ट ने भी 'आर्यभट्टीयम्' के गणितपाद में यह नियम प्रतिपादित किया है-
"त्रैराशिकफलराशिं तमथेच्छाराशिना हंत कृत्वा ।
लब्धं प्रमाणभजितं तस्मादिच्छाफलमिदं स्यात् ॥" -
आर्यभटीयम्, गणितपाद-26
अर्थात् त्रैराशिक नियम में फलराशि को इच्छा राशि से गुणा करते हैं और प्राप्तांश को प्रमाणराशि से भाग देते हैं तो इच्छा फल प्राप्त होता है। इस नियम का सूत्र निम्नलिखित है-
इच्छा = प्रमाण
इच्छा फल प्रमाण फल
इच्छाफल = फलराशि × इच्छाराशि / प्रमाणराशि
यहाँ प्रमाण का अर्थ है ज्ञातराशि तथा फल का अर्थ है-ज्ञातराशि में ज्ञातफल। इच्छाराशि का तात्पर्य है जिस अज्ञात राशि प्रमाण में फल जानना हो एवं इच्छाफल का अर्थ है अभीष्ट राशि प्रमाण का जो फल प्राप्त होगा, वह चतुर्थ राशि होगी। त्रैराशिक में प्रमाण और इच्छा सजातीय होती है और दोनों के बीच का फल विजातीय होता है।
इसके अतिरिक्त यहाँ भिन्नत्रैराशिक के विषय में भी बतलाया गया है-
"छेदाः परस्परहता भवन्ति गुणकारभागहाराणां ।"
अर्थात् अलग-अलग राशियों को परस्पर गुणा करने पर जो फल प्राप्त हो, उनके भागों का गुणा तथा हारों का गुणा एक समान होता है।
उदाहरण के लिए, दो अलग-अलग राशियों अथवा दो से अधिक राशियों (क, ख, ग, घ) का गुणा निम्न प्रकार है-
(क / ख) × (ग / घ) = (क ग) / (ख घ)
जो एक समान होता है।
ब्रह्मगुप्त ने 'ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त' में तथा भास्कराचार्य द्वितीय ने 'लीलावती' में अनेक प्रकार के सवर्णों का वर्णन किया है। भिन्नों के हर की संख्या को आपस में गुणा करने पर उनके परस्पर गुणा का हर प्राप्त किया है तथा भिन्नों के भाग (अंश) को परस्पर गुणा करने पर गुणकार की अंश संख्या प्राप्त होती है। आर्यभट्टीय के टीकाकार सूर्यदेव याजवन का उदाहरण निम्नलिखित है-
12½ : 1⅛ :: 6¼: क
यहाँ सवर्णित करके 'क' का मान ज्ञात करना है। इसलिए
(25/2): (9/8):: (25/4): क
अथवा (25/2) / (9/8) = (25/4)/ क
अथवा (25/2) × क = (25/4) × (9/8)
अथवा 25क/2 = 225/32
अथवा
क = (225 × 2) / (25 × 32)
= 450/800
= 9/16 अभीष्ट फल
इस प्रकार लीलावती में भी त्रैराशिक नियम का वर्णन किया गया है-
"प्रमाणमिच्छा च समानजाती आद्यन्तयोस्तत्फलमन्यजातिः ।
मध्ये तदिच्छाहतमाद्यहृत् स्यादिच्छाफलं व्यस्तविधिर्विलोमे। त्रैराशिक नियम, लीलावती 7
अर्थात् तीन ज्ञात राशियों में से चौथी राशि का ज्ञान जिस गणित से होता है, उसे त्रैराशिक कहते हैं। यहाँ भी आचार्य ने तीनों ज्ञात राशियों के नाम क्रम से 'प्रमाण', 'प्रमाण फल' और 'इच्छा' रखे हैं। अज्ञात चौथी राशि का नाम इच्छा फल है। प्रमाण और इच्छा एक जाति की होती है। इनको आदि और अन्त में लिखना चाहिये। प्रमाण फल को इच्छा से गुणा कर प्रमाण से भाग देने पर इच्छा फल प्राप्त होता है।
उदाहरण के तौर पर, जैसे किसी ने प्रश्न किया कि 1 रू० में 5 आम मिलते हैं, तो 5 रू० में कितने आम मिलेंगे?
यहाँ 1 रू० = प्रमाण।
5 आम = प्रमाण फल।
5 रू०= इच्छा।
अब पूर्व रीति से प्रमाण फल को इच्छा से गुणा कर प्रमाण से भाग दिया तो,
चौथी अज्ञात राशि इच्छा फल = प्रमाण फल × इच्छा ÷ प्रमाण
= 5 × 5/1
= 25 के रुप में प्राप्त होगा। अर्थात 25 आम प्राप्त होंगे।
भास्कराचार्य ने लीलावती में क्रम त्रैराशिक नियम के साथ साथ व्यस्त त्रैराशिक नियम के विषय में भी बताया है। हम क्रम त्रैराशिक नियम में जो क्रिया करते हैं, वही विलोम में अर्थात् व्यस्त त्रैराशिक में उल्टी करनी चाहिए, अर्थात् प्रमाण को प्रमाण फल से गुणा कर इच्छा से भाग देने पर इच्छा फल प्राप्त होता है।
क्रम त्रैराशिक में इच्छा की न्यूनता या वृद्धि से इच्छा फल की न्यूनता या वृद्धि होती है और व्यस्त त्रैराशिक में इसकी उल्टी रीति समझनी चाहिए। आगे ग्रन्थकार ने स्वयं ही स्पष्टीकरण किया है-
क्रम त्रैराशिक नियम की उपपत्ति-
प्रमाण / प्रमाण फल : : इच्छा / इच्छा फल
प्रमाण × इच्छाफल = प्रमाणफल × इच्छा ।
इच्छाफल = प्रमाणफल × इच्छा / प्रमाण, यह क्रम त्रैराशिक नियम है।
व्यस्त त्रैराशिक में-
प्रमाणफल / इच्छा = इच्छा फल / प्रमाण,
इच्छा फल = प्रमाणफल × प्रमाण/इच्छा।
व्यस्त त्रैराशिक का लक्षण देते हुए भास्कराचार्य कहते हैं-
"इच्छावृद्धौ फले हासो ह्रासे वृद्धिः फलस्य तु।
व्यस्तं त्रैराशिकं तत्र ज्ञयं गणितकोविदैः ।।"
व्यस्त त्रैराशिक, लीलावती 8
अर्थात् जहाँ इच्छा की वृद्धि में फल की कमी हो, तथा इच्छा की कमी में फल की वृद्धि हो वहाँ गणितज्ञों को व्यस्त त्रैराशिक जानना चाहिये। व्यस्त त्रैराशिक नियम का प्रयोग कहाँ-कहाँ होता है, इसको बतलाते हुए कहा गया है कि प्राणियों की अवस्था के मूल्य में, अच्छे के साथ बुरे सोने की तौल में और राशियों के भागहार अर्थात् किसी संख्या में विभिन्न भाजकों से भाग देने में व्यस्त त्रैराशिक होता है
"जीवानां वयसो मौल्ये तौल्ये वर्णस्य हैमने।
भागहारे च राशीनां व्यस्तं त्रैराशिकं भवेत् ||"
उदाहरण के तौर पर, यदि 16 वर्ष की स्त्री 32 रूपये पाती है, तो 20 वर्ष की स्त्री कितने रूपये पायेगी।
इसका समाधान इस प्रकार है, यहाँ
प्रमाण = 16,
प्रमाण फल=32 और
इच्छा 20 है।
प्रश्न में प्राणियों का मूल्य लाना है अतः व्यस्त त्रैराशिक होने के कारण प्रमाण को प्रमाण फल से गुणा कर इच्छा से भाग देने पर इच्छा फल होगा। अब उक्त रीति से इच्छा फल
= 16×32/20
=4×32/5
=128/51
1. त्रैराशिक नियम से सम्बन्धित कुछ महत्त्वपूर्ण बिंदु इस प्रकार हैं यथा- सजातीय (एक ही जाति की दो) संख्याओं के बीच जो सम्बन्ध होता है उसे उन राशियों का अनुपात या निष्पत्ति कहते हैं। सजातीय दो संख्याओं की परस्पर तुलना करने पर सम्बन्ध का पता चलता है,
जैसे 5 रू० और 15 रू० में तुलना करने पर 5 से 15 तीन गुणा है, अतः 5 रू० और 15 रू० में 1 और 3 का सम्बन्ध है। इसलिये 5 रू० और 15 रू० का अनुपात 1/3 है।
इसी तरह 1 मन और 25 सेर में 40/25 = 8/5 का अनुपात है।
2. दो अनुपातों के बीच पहली राशियों के गुणनफल को पहली राशि तथा दूसरी राशियों के गुणनफल को दूसरी राशि बना लेने से सम्मिलित अनुपात (निष्पत्ति) बन जाता है।
यथा-1:3 और 8:5 का सम्मिलित अनुपात (1 × 8)/(3 × 5) = 8:15
3. यदि चार राशियाँ ऐसी हों जिनमें पहली और दूसरी की निष्पत्ति, तीसरी और चौथी की निष्पत्ति के समान हो तो इन्हें समानुपाती कहते हैं। यथा-5, 6, 15, 18 ये चारों राशियाँ समानुपाती हैं, क्योंकि यहाँ 5 : 6 : : 15 : 18 |
यदि चार राशियाँ समानुपाती हों, तो उन चारों को सजातीय होने की आवश्यकता नहीं। उनमें केवल पहली और दूसरी तथा तीसरी और चौथी राशि को सजातीय होना चाहिये, यथा-3 रू०, 5 रू०, 12 मन और 20 मन ये चारों राशियाँ समानुपाती हैं क्योंकि यहाँ 3 रू० और 5 रू० की निष्पत्ति 12 मन तथा 2 20 मन की निष्पत्ति के बराबर है। UNIVERSITY
4. समानुपात में पहली और चौथी संख्या को अन्त्य राशि तथा दूसरी और तीसरी को मध्य राशि कहते हैं। यथा-3, 4, 15, 20, यहाँ 3 और 20 अन्त्य राशियाँ तथा 4 और 15 मध्य राशियाँ हैं।
समानुपात में अन्त्य राशियों का गुणनफल मध्य राशियों के गुणनफल के बराबर होता है, यथा ऊपर के उदाहरण में अन्त्य राशियों का गुणनफल 3X20=60 तथा मध्य राशियों का गुणनफल 4x15=60, दोनों बराबर हैं।
5. यदि चार राशियाँ समानुपाती हों तो
पहली : दूसरी : : तीसरी : चौथी
दूसरी : पहली : : चौथी : तीसरी
चौथी : तीसरी : : दूसरी : पहली
और यदि चारों राशियाँ सजातीय हों तो
पहली : तीसरी : : दूसरी : चौथी ।
6. यदि तीन राशियाँ ऐसी हों जिनमें पहली और दूसरी की निष्पत्ति, दूसरी और तीसरी की निष्पत्ति के समान हो, तो उन्हें संलग्न समानुपाती कहते हैं। दूसरी राशि को पहली और तीसरी को मध्य समानुपाती तथा तीसरी को पहली और दूसरी को तृतीय समानुपाती कहते हैं। (लीलावती, पृ० 103-105)
वस्तुतः यह त्रैराशिक नियम प्राचीन काल से चला आ रहा है और आज भी इसका प्रयोग अक्षुण्ण बना हुआ है।
भारतीय गणितशास्त्र की परम्परा में त्रैराशिक नियम की बड़ी प्रतिष्ठा है और यही कारण है कि भास्कराचार्य ने इसे समस्त अंकगणित का मूल कहा है- "अस्ति त्रैराशिकं पाटी...।" (लीलावती, पृ० 93) निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि वैदिक गणित और त्रैराशिक नियम ही नहीं, अपितु अंक-प्रणाली, शून्य, दाशमिक प्रणाली आदि गणित की सभी विधाओं में भारत का विश्व के प्रति अमूल्य एवं अकथनीय योगदान रहा है। अल्बर्ट आइन्सटीन ने भारतीय गणित की प्रशंसा करते हुए कहा है-"We owe a lot to the Indians, who taught us how to count, without which no worth while scientific discovery could have been made."
अभ्यास प्रश्न
1) वैदिक गणित की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
2) त्रैराशिक नियम पर प्रकाश डालिए।
त्रैराशिक नियम से सम्बन्धित सवालों को हल करें।
क) दो धूर वहन करने वाला बैल यदि 4 निष्क पाता है, तो 6 धूर वहन करने वाला बैल क्या पायेगा। [ 4/3 निष्क]
ख) यदि अन्न की राशि को 7 आढक के मान से नापने पर 100 मान होते हैं, तो उसे 5 आढक के मान से नापने पर कितने होंगे। [ 140 मान ]
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