वेदों में 1 से 10 तक की गणना किस प्रकार की गई है ?
यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा।
तद्वद् वेदांगशास्त्राणां गणितं मूर्धिन स्थितम् ।।
जैसे मोर की कलंगी तथा नागों की मणियाँ उनके मस्तक पर विराजमान होती हैं, उसी प्रकार गणित सभी वेदांग शास्त्रों में सर्वोच्च शीर्ष पर विराजमान होता है।
वैदो के अध्यन से पता चलता है कि गणना का काम तथा इसका अनुक्रम वैदिक युग से प्रारम्भ हो चुका था। 1 से 10 तक के लिये मौलिक शब्दों की खोज की जा चुकी थी। वास्तव में ये शब्द कितने पुराने हैं, इनका अन्दाजा लगाना आसान नहीं हैं।
यह रोचक बात है कि संख्याओं को गिनने का सबसे पहला आधार उँगलियाँ बनी थी। इसे झुठलाया नहीं जा सकता कि ये उँगलियाँ मनुष्य के पास सबसे सुलभ साधन थीं।
10 तक की संख्याओं के लिये उँगलियाँ आधार बनी, इसका प्रमाण वेद के एक रोचक मन्त्र में उपलब्ध है। उँगलियों की अनेक विशेषताओं के आधार पर उन्हें अवनि, कक्ष्या आदि अनेक नाम दिये हैं तथा इन सबके साथ 'दश संख्या का उपयोग किया है।"
दशावनिभ्यों देश कक्ष्येभ्यो दश योक्तेभ्यो दश योजनेभ्यः ।
दशाभीशुभ्यो अर्चताजरेभ्यो दश धुरो दश युक्ता वहदभ्यः ।। ऋग्वेद 10.94.7
इसमें कहा है कि इन अनेक विशेषताओं वाली 10 उंगलियों से सोम निचोड़ने वाले पत्थर की स्तुति करो।
भाषाविज्ञान के विद्वानों का अनुमान है कि उंगली के लिये इंग्लिश में finger शब्द संस्कृत के पञ्च से निकला है। इससे यूरोप में एक हाथ की पाँच उंगलियों को आधार बना कर इस शब्द का प्रचलन हुआ था।
एकं ब्रह्म द्वयं तत्त्वं पुरुषः प्रकृतिस्तथा।
त्रयो लोकाश्चतुर्वेदाः पञ्च भूतानि षड्रसाः॥
सप्त लोकाः स्मृता लोके धातवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः।
नव रत्नानि दिग्भेदाः दश प्रोक्ताः मनीषिभिः॥
(अर्थ – संक्षेप में)
एक ब्रह्म है, दो तत्व पुरुष–प्रकृति हैं,
तीन लोक, चार वेद, पाँच महाभूत, छह रस,
सात लोक, आठ धातु, नौ रत्न
और दस दिशाएँ मनीषियों द्वारा कही गई हैं।
वैदिक युग में 3 लोक, 4 वेद, 5 महाभूत, 6 रस, 7 लोक, 8 धातु, 9 रत्न, 10 दिशाओं को गिनने के लिये विशेष रूप से संख्याओं का उपयोग हुआ।
अब पूरा 1 से 10 तक का क्रम देखिए—
1. एक – ब्रह्म / आत्मतत्त्व
2. दो – पुरुष–प्रकृति
3. तीन – त्रिलोक
4. चार – वेद
5. पाँच – महाभूत
6. छह – रस
7. सात – लोक
8. आठ – धातु
9. नौ – रत्न
10. दस – दिशाएँ
अतः हम कह सकते हैं कि इस प्रकार अमूर्त (abstract) संख्याओं के आधार पर दुनिया के देखे सुने जाने वाले मूर्त पदार्थों को जानने समझने की कोशिश शुरु हुई। इससे गिनती सम्भव हो सकी।
हर वस्तु की विशेषता के अलावा संख्या के माध्यम से एक नई पहचान मिल सकी। आगे के युगों में संख्याओं द्वारा मिलने वाली पहचान को अधिक से अधिक अच्छे रूप में समझा जा सका ।
1. तत्त्व (एक)
ब्रह्म / आत्मा / परमसत्य
“एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति”
एक ही सत्य है, ज्ञानी उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।
यही समस्त सृष्टि का मूल कारण है।
2. तत्त्व (दो)
पुरुष – चेतन तत्त्व
प्रकृति – जड़ तत्त्व
(सांख्य दर्शन के अनुसार)
इन दोनों के संयोग से सृष्टि की उत्पत्ति होती है।
निश्चय ही। भारतीय परंपरा में संख्याओं के साथ जुड़े तत्व इस प्रकार पूर्ण रूप में होते हैं—
3 लोक
- भूर्लोक – मनुष्य तथा स्थूल जगत
- भुवर्लोक – देवगण, गंधर्व, पितृ
- स्वर्लोक – इन्द्र तथा देवताओं का लोक
4 वेद
- ऋग्वेद – देवताओं की स्तुतियाँ
- यजुर्वेद – यज्ञ-कर्म विधि
- सामवेद – गायन व संगीतमय मंत्र
- अथर्ववेद – गृहस्थ जीवन, रोग-निवारण, तंत्र
5 महाभूत
- पृथ्वी
- जल
- अग्नि (तेज)
- वायु
- आकाश
6 रस
- मधुर (मीठा)
- अम्ल (खट्टा)
- लवण (नमकीन)
- कटु (तीखा)
- तिक्त (कड़वा)
- कषाय (कसैला)
7 लोक
- भूर्लोक
- भुवर्लोक
- स्वर्लोक
- महर्लोक
- जनलोक
- तपोलोक
- सत्यलोक (ब्रह्मलोक)
8 धातु (आयुर्वेद के अनुसार)
- रस
- रक्त
- मांस
- मेद
- अस्थि
- मज्जा
- शुक्र/आर्तव
- ओज (सार तत्त्व)
9 रत्न (नवरत्न)
- माणिक्य (सूर्य)
- मोती (चन्द्र)
- मूंगा (मंगल)
- पन्ना (बुध)
- पीतपुखराज (गुरु)
- हीरा (शुक्र)
- नीलम (शनि)
- गोमेद (राहु)
- लहसुनिया (केतु)
10 दिशाएँ
- पूर्व
- पश्चिम
- उत्तर
- दक्षिण
- ईशान (उत्तर-पूर्व)
- आग्नेय (दक्षिण-पूर्व)
- नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम)
- वायव्य (उत्तर-पश्चिम)
- ऊर्ध्व (आकाश)
- अधः (पाताल)
एक ब्रह्म अनंत ज्योति,
दो तत्त्व जग की पोथी।
तीन लोक फैला आकाश,
चार वेद ज्ञान का प्रकाश॥
पाँच भूत जग रचें देह,
छह रस जीवन का स्नेह।
सात लोक साधना का पंथ,
आठ धातु देह का ग्रंथ॥
नौ रत्न चमकें ग्रह संग,
दस दिशाएँ जग का रंग।
संख्या में छुपा है ज्ञान,
भारत की यही पहचान॥
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