प्राचीन भारतीय गणित का विस्तार तथा मौलिक उपयोग
गणित में मौलिक संख्याओं के द्वारा वस्तुओं की गणना की संक्रिया के पश्चात् हर युग में उसका विस्तार होता रहा। पिछले परिच्छेद में कहा है कि उँगलियों को गिनने के लिये संख्याओं के मौलिक शब्द एक से दस तक ही हैं। इसके पश्चात् की अतिविस्तृत संख्याएं इन्हीं मौलिक संख्याओं के योग और गुणन से निर्मित हुई हैं। इन आगे की संख्याओं के नाम और लेखन से भी यही तथ्य प्रकट होता है।
संस्कृत में दश के पश्चात् एकादश द्वादश आदि अथवा विंशति के पश्चात् एकविंशति द्वाविंशति आदि संख्याओं के नाम कमशः 1+20 तथा 2+20 आदि योग की पद्धति से 20+2 आदि योग की पद्धति का उपयोग हुआ है।
निर्मित हुए हैं। इंग्लिश में भी twenty one, twenty two आदि के लिये 20+1 इसके साथ ही 20, 30 आदि दाशमिक संख्याओं के नामकरण के लिये गुणन की पद्धति का उपयोग किया गया। विंशति (20), त्रिंशत् (30) इत्यादि शब्दों के निर्वचन से ज्ञात होता है कि इनका मौलिक अर्थ कमशः 2×10=20, 3 ×10=30 है। इसके पश्चात् शतम् (100) भारत से लेकर यूरोप तक सबसे प्रसिद्ध संख्याओं में एक है। आधुनिक भाषा विज्ञान के विद्वानों ने भारोपीय भाषाओं में संख्याओं के एक वर्ग के प्रतिनिधि शब्द के रुप में सर्वसम्मति से इसे स्वीकार किया है।
इस 'शतम्' के समानान्तर शब्द इन भाषाओं में समान रुप से प्राप्त होते हैं।
'शतम्' से आगे की संख्याओं के बहुत से शब्द भी भारत की तद्भव भाषाओं में कुछ परिवर्तन के साथ अपना लिये गए हैं। वेद में कहे गए अयुत, नियुत जैसे कुछ शब्द छोड़े भी गए हैं। बौद्ध साहित्य में प्रचलित 'लक्ष' आदि कुछ संख्याओं को अपनाया गया हैं। संस्कृत में स्वीकृत प्राकृत शब्दों से आज की हिन्दी आदि भाषाओं में कुछ शब्द विकसित हुए हैं। संस्कृत में मेघ अर्थ में 'अम्बुद' शब्द है। उसके प्राकृत रूप 'अर्बुद' को संस्कृत शब्दों में स्वीकार कर लिया गया। इससे ही हिन्दी में 'अरब' संख्या विकसित हुई है। इसका 'अरब' देश से कोई संबंध नहीं है।
भारतीय संख्या लेखन में शतम् तथा इससे आगे की संख्याओं को दशगुणित रुप में प्रकट करने की परम्परा रही है। यह परम्परा शब्दों के निर्वचन में छिपी हुई हैं। शतम का निर्वचन इस प्रकार है:
शतं दश दशतः निरुक्त। अर्थात् -
शतम् = 10 × 10 सहस्रम् (10×10)×10
आधुनिक संख्या लेखन में -
सौ (hundred) = 10²=10×10, हजार (Thousand) = 10 = 10×10×10
यह कितना सुखद अचरजमरा तथ्य है कि आधुनिक वैज्ञानिक संख्या लेखन की रुपरेखा प्राचीन भारतीय लेखन में प्राप्त है। भारतीय मनीषा ने इस रुपरेखा को शब्दों में समाविष्ट कर दिया है, ताकि इसे कोई बदल न सके तथा भूल न सके। शब्द निर्वचन में इस प्रकिया के सुरक्षित होने से आज हम निस्सन्दिग्ध रूप से कह सकते है कि प्राचीन युग में संख्या लेखन की वैज्ञानिक प्रकिया विद्यमान थी।
यजुर्वेद में इस प्रक्रिया को सुरक्षित रखते हुए क्रमशः दशगुणित संख्या का नाम रखते हुए अन्तिम सबसे बड़ी संख्या परार्ध का उल्लेख किया है, जो कि आधुनिक संख्या लेखन में 10" के समतुल्य है।.... एका च् दश च दश च शतं च शतं च सहस्रायुतं चायुतं च नियुतं च नियुतं च... माघ यं चान्तश्च परार्धश्चौता मे अग्न इष्टका धेनवः सन्त्त्वत्रामुष्मिल्लोके । (यजुर्वेद 17.2) यह उल्लेख बहुत रोचक है कि वेद में इतनी बड़ी संख्या का उपयोग गायों तथा यज्ञवेदी की ईंटों को गिनने के लिये हुआ है। वहाँ कहा है कि इस लोक में इतनी गाएँ सुरक्षित रहें। यह मानने का पर्याप्त आधार है कि मोहंजोदारो की सभ्यता में पक्के मकान, नालियाँ इत्यादि बनाने के लिये ईंटों का प्रयोग होता था। पर वेद में तो यज्ञवेदि की ईंटों को गिनने के लिए इतनी बड़ी संख्या का उपयोग हुआ है। इसी प्रकार इतनी बड़ी संख्या में गायों की प्रार्थना से हर घर में गायों के उपयोग की सूचना मिलती है।
तैत्तिरीय संहिता में तो यजुर्वेद की परार्ध संख्या के पश्चात् उषस्, उद्यत्, उदित, सवर्ग तथा सबसे अन्त में 'लोक' नामक सबसे बड़ी संख्या का वर्णन है, जो 10¹⁹ के समतुल्य है।
इतने प्राचीनतम युग में इतनी बड़ी संख्याओं का लेखन किस प्रकार होता था, यह अनुमान का विषय है, क्योंकि उस समय के लेखन का स्वरूप उपलब्ध नहीं है। मेगस्थनीज ने मौर्य युग (ईसा पूर्व चौथी शताब्दी) में सड़कों पर मील के पत्थर का वर्णन किया है। उन पत्थरों में अवश्य ही संख्या लेखन रहा होगा। कौटिल्य अर्थशास्त्र में गणनादृपुस्तक में कर्मचारियों के वेतन, भत्ते आदि की गणना रखने का उल्लेख है। उसमें उस विभाग के संख्यायक (accountant), लेखक (Clerk) आदि का भी वर्णन है। स्पष्टतः इनमें बड़ी-बड़ी संख्याएँ लिखी जाती होंगी। ब्राह्मी लिपि में संख्या लेखन होता था। इस लिपि में उपलब्ध संख्या लेखन से पूर्व इसके उपयोग का आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है क्योंकि कोई भी लेखन तत्काल उत्पन्न होकर प्रचारित नहीं हो सकता। इसकी प्रतिष्ठा और प्रचार में शताब्दियाँ लगती हैं।
संख्या शब्दों में स्थानीय मान के उपयोग का संकेत अतिप्राचीन ग्रन्थ निरुक्त में 'दश' के निर्वचन में प्राप्त है। (दश दस्तादृनिरुक्त 3.10) योग सूत्र में इसका स्पष्ट उल्लेख है। वहाँ कहा कि एक ही रेखा किसी विशिष्ट स्थान में 100, अन्य स्थान में 10 तथा उससे अन्य स्थान में 1 का बोध कराती है। (यथैका रेखा शत स्थाने शतं दश स्थाने दशैका च एक स्थाने योग सूत्र 3.13 पर व्यास भाष्य)
इनके लिये संख्या शब्द का प्रयोग शतपथ ब्राह्मण 7.31.43 में उपलब्ध हुआ है। वहाँ कहा है कि इन असंख्यों की संख्या क्या है। (कैतासामसंख्यातानां संख्या शतपथ ब्राह्मण) इससे प्रकट है कि वे बड़ी-बड़ी संख्याओं को भी गिनने का सामर्थ्य रखते थे। आगे चलकर इनके लिये 'अंक' शब्द का प्रयोग प्रारम्भ हुआ, क्योंकि ये किसी भी वस्तुत को चिहिनत करने का सामर्थय रखते थे। भारतीय दर्शन में संख्याओं की इस विशेषता का विस्तार से वर्णन किया गया है।
1.4 प्राचीन भारत में अड.क गणित का विकास
जिस गणित में अड्क से सम्बन्धित विशेष संक्रियाएँ हो, उसे अङ्क गणित कहा जाता है। पिछले परिच्छेद में बताया गया है कि अनेक संख्या शब्द योग तथा गुणन की संक्रियाओं के आधार पर विकसित हुए हैं। 'द्वादश प्रधयश्चक्रमेकम्' (ऋग्वेद 1.164.48) इस मन्त्र में द्वादश शब्द 2+10–12 अर्थ रखता है। 'सप्तशतानि विंशतिश्च तस्थुः (ऋग्वेद 1.164.11) यहाँ विंशति शब्द 2×10=20 अर्थ वाला है। इस सम्पूर्ण पाद में 700+20=720, यहाँ सैकड़ा संख्या के साथ जोड़ की संक्रिया की गई है।
वेद में प्राप्त 'एकोनविंशति' शब्द व्यवकलन या घटाने की संक्रिया को प्रकट करता है। इसका अर्थ एकोन एक कम, विंशति 20 है। इस प्रकार यह शब्द 20–1=19, इस संक्रिया से निष्पन्न है। इस शब्द से हिन्दी का 'उन्नीस' शब्द विकसित है।
यजुर्वेद के एक रोचक मन्त्र 'चतस्रश्च मेऽष्टौ च मे द्वादश च मे .... यज्ञेन कल्पताम् (यजुर्वेद 18.25) में 4 संख्या को 1-2-3... से गुणित करते हुए उनका नाम सहित उल्लेख किया गया है। इस प्रकार वहाँ समान्तर श्रेणी का विकास किया गया है। इस मन्त्र में 4-4 के समूह के पात्र यज्ञ से जुड़े, ऐसा कहा गया है। पञ्चविंश ब्राह्मण में 12-24-48-96 के कम से 393216 तक कहते हुए गुणोत्तर श्रेणी का उदाहरण प्रस्तुत किया गया है। वेद के ही एक मन्त्र में सम संख्याएँ तथा एक अन्य मन्त्र में विषम संख्याओं का उल्लेख किया गया है। (एका च मे तिस्रश्च मे तिसश्च मे पञ्च च मे पञ्च च में में.... यज्ञेन कल्पन्ताम् - यजुर्वेद 8.24)
इसके साथ ही वेद के अनेक शब्दों से भिन्न संख्याएँ तथा उन पर योग आदि की संक्रियाएं सूचित की गई हैं। जैसे
वहाँ पाद शब्द को ¼ माना है। क्योंकि गाय के चार पैर होते हैं।उन्हें यदि समूह में 1 माना जावे तो उस सम्पूर्ण के सापेक्ष 1 पाद (पैर) = 1/4 के समतुल्य है।
इसी प्रकार शफ शब्द को 1/8 माना है। क्योंकि गाय के 8 खुर होते हैं। उन खुरों के 1 समूह के सापेक्ष 1 खुर 1/8 है। वहाँ इन्हीं कारणों से कुष्ठ शब्द 1/12 अर्थ में प्राप्त है।
पाद = 1/4
खुर = 1/8
कुष्ठ = 1/12
इन शब्दों पर अनेक संक्रियाओं द्वारा पुनः अनेक शब्द निर्मित हुए हैं। जैसे पाद = 1 4 के आधार पर :
सपाद (हिन्दी में सवाया) = 1+1/4 = 5/4 (चौथाई सहित एक)।
पादोन (हिन्दी में पौना) = 1–1/4 = 3/4 (चौथाई कम एक)
पारिभाषिक शब्दों के अन्तर्गत अर्ध है। इस पर गणितीय संक्रिया द्वारा अथर्ववेद में प्राप्त शब्द
अध्यर्ध (आधा सहित एक) = 1 + 1/2
इसके समानान्तर द्वयर्ध (डेढ़) = 2 –1/2 (दो से आधा कम)
प्राचीन भारतीय गणित के अन्तर्गत शुल्व सूत्र को भी सम्मिलित किया जाता है। वैदिक युग में 3000 वर्ष ईसा पूर्व में बौधायन, कात्यायन आदि अनेक ऋषियों द्वारा इनकी रचना की गई थी। इनके नाम से स्पष्ट है कि ये सूत्र पद्धति में रचे गए थे। इस शैली में संक्षेप शब्दों में अधिक विषय की गद्य रचना की जाती थी। शुल्व का अर्थ रस्सी होता था। आजकल कारीगरों द्वारा नापने के लिए टेप की तरह रस्सी का प्रयोग होता था। गणित में इसका सर्वाधिक उपयोग होने से इसका नाम शुल्व गणित रखा गया था।
शुल्व सूत्र की रचना का प्रमुख उद्देश्य यज्ञ में प्रयोग की जाने वाली अनेक प्रकार की वेदियों का निर्माण करना था। उस समय अनेक प्रकार की कामना पूर्ति के लिये ज्योतिष्टोम आदि बड़े बड़े यज्ञों का अनुष्ठान किया जाता था। इसके लिये अनेक प्रकार की एवं विविध आकार की वेदियों का निर्माण किया जाता था। शुल्व सूत्रों में इनके लिये अंक गणित, रेखा गणित से सम्बन्धित अनेक विधियों, सिद्धान्तों का वर्णन किया गया है। इस प्रकार भारत में गणित का अवतरण तथा विकास मूलतः यज्ञ कार्यों के लिये हुआ था।
आपने ऊपर देखा है कि वेद में गणित के शब्दों का उल्लेख है। शुल्व गणित में इससे आगे बढ़कर गणित की संक्रियाओं तथा इनके आधार पर अनेक प्रकार की वेदी निर्माण का वर्णन प्राप्त होता है। यहाँ अंक गणित की ऐसी कुछ विधियों का वर्णन प्रस्तुत है :
गणित में माना है कि किसी संख्या को उसी समान संख्या से गुणित करने पर प्राप्त परिणाम 'वर्ग' कहा जाता है। (समद्विघातः कृतिः) ।
तदनुसार-
2² = 2 × 2 = 4 वर्ग हस्त (द्वाभ्यां चत्वारि)
प्रमाण तृतीयेन वर्धयेत् तच्च चतुर्थेनात्मचतुस्त्रिंशोनेन । (बौधायन शुल्व सूत्र 1.2. 61)
प्रमाणं तृतीयेन वर्धयेत्। sqrt(2) = 1 + 1/3
1/(3 * 4) तच्च चतुर्थेन
आत्मचतुस्त्रिंशोनेन - 1/(3 * 4 * 34)
इस संक्रिया को एक साथ लिखने पर यह परिणाम प्राप्त होता है-
sqrt(2) = 1 + 1/3 + 1/(3 * 4) - 1/(3 * 4 * 34)
1
4x34
17 1 577 =1.41421 12 408 408
13
इस संक्रिया को आगे बढ़ाने पर 3 का वर्गमूल इस प्रकार प्राप्त होता है -
1 √3=1+3+3x5 3x5x52 26 1 1351 = 15 780 780 = 1.73205
यह कितना सुखद् विस्मयकारी है कि आधुनिक गणित में भी 2 तथा 3 के वर्गमूल का 4 दशमलव संख्या तक यही मान प्राप्त होता है। शुल्व सूत्र की इस संक्रिया की सार्वत्रिक विधि तथा तार्किकता अभी तक ज्ञात नहीं हो पाई है। परन्तु इतना तो स्पष्ट है कि शुल्व सूत्र के ऋषि इसे ज्ञात कर चुके थे।
1.5 प्राचीन भारत में रेखा गणित एवं बीज गणित का विकास
प्राचीन भारतीय गणित में रेखा गणित का सर्वाधिक विकास हुआ था। उस समय तत्वदर्शी ऋषि प्रकृति की अनेक आकृतियों से बहुत प्रभावित हुए थे। उन्होंने उन आकृतियों को यज्ञवेदियों, यज्ञपात्रों में अनुकृत करने का प्रयास किया। इस क्रम में उन आकृतियों के नाम, पहचान, उनका मापन, उन्हें द्विगुणित, त्रिगुणित इत्यादि करने के सूत्र विकसित किये गये ।
इस प्रकार किसी पत्थर या लकड़ी की चतुर्भुज आकृति को चतुरश्र नाम दिया गया । इसका अर्थ 'चार कोनों वाला' यह है। यह शब्द इस आकृति की सही पहचान बताता है। इसके दो विभाजन विकसित किये गये। समान भुजाओं से बनने वाले को 'समचतुरस्र' कहा गया। इसे आजकल वर्ग कहते हैं। दो असमान भुजाओं से बनने वाले को 'आयतचतुरस्र' कहा गया। आजकल इस के एक हिस्से 'आयत' शब्द के प्रयोग का प्रचलन है। UNIVERSIT
वर्ग या आयत का क्षेत्रफल शुल्व सूत्र कहा है कि वर्ग या आयत जितने पद या सेमी लम्बा तथा चौड़ा हो, उतनी रेखाएं एक-एक पद या सेमी की दूरी पर खींचें। इससे एक एक वर्ग पद (या आधुनिक 1 सेमी) के मानक मात्रक प्राप्त होंगे। उन्हें जोड़ने पर जितने मानक मात्रक प्राप्त हों, उतने वर्ग क्षेत्रफल का यह वर्ग या आयत होगा। (यावत् प्रमाणा रज्जुर्भवति तावन्तस्तावन्तो वर्गा भवन्ति, तान् समस्येत् कात्यायन शुल्व सूत्र 3.7)।
वर्ग के विकर्ण पर बनने वाला वर्ग आगे कहा गया है किसी समचतुरस्र अर्थात वर्ग (a) के विकर्ण (diagonal) पर बनने वाला वर्ग अपने पिछले वर्ग (a) के क्षेत्रफल से दुगुने क्षेत्रफल वाला होता है। (समचतुरस्रस्याक्ष्याया रज्जुर्दिस्तावती भूमिं करोति । (बौधायन शुल्व सूत्र 1.45) इसका कारण यह बताया गया है कि इस वर्ग (a) पर बनने वाले विकर्ण का प्रमाण a गणित द्विकरणी या 2 का वर्गमूल अर्थात a√2 होता है। इसे इस प्रकार सिद्ध करते है :
17 1 577 =1.41421 12 408 408
इस संक्रिया को आगे बढ़ाने पर 3 का वर्गमूल इस प्रकार प्राप्त होता है -
√3=1+2+ 1 1 3 3×5 3×5×52 26 1 1351 =1.73205 15 780 780
यह कितना सुखद् विस्मयकारी है कि आधुनिक गणित में भी 2 तथा 3 के वर्गमूल का 4 दशमलव संख्या तक यही मान प्राप्त होता है। शुल्व सूत्र की इस संक्रिया की सार्वत्रिक विधि तथा तार्किकता अभी तक ज्ञात नहीं हो पाई है। परन्तु इतना तो स्पष्ट है कि शुल्व सूत्र के ऋषि इसे ज्ञात कर चुके थे।
1.5 प्राचीन भारत में रेखा गणित एवं बीज गणित का विकास
प्राचीन भारतीय गणित में रेखा गणित का सर्वाधिक विकास हुआ था। उस समय तत्वदर्शी ऋषि प्रकृति की अनेक आकृतियों से बहुत प्रभावित हुए थे। उन्होंने उन आकृतियों को यज्ञवेदियों, यज्ञपात्रों में अनुकृत करने का प्रयास किया। इस क्रम में उन आकृतियों के नाम, पहचान, उनका मापन, उन्हें द्विगुणित, त्रिगुणित इत्यादि करने के सूत्र विकसित किये गये ।
इस प्रकार किसी पत्थर या लकड़ी की चतुर्भुज आकृति को चतुरश्र नाम दिया गया । इसका अर्थ 'चार कोनों वाला यह है। यह शब्द इस आकृति की सही पहचान बताता है। इसके दो विभाजन विकसित किये गये। समान भुजाओं से बनने वाले को 'समचतुरस्र' कहा गया। इसे आजकल वर्ग कहते हैं। दो असमान भुजाओं से बनने वाले को 'आयतचतुरस्र' कहा गया। आजकल इस के एक हिस्से 'आयत' शब्द के प्रयोग का प्रचलन है।
वर्ग या आयत का क्षेत्रफल शुल्व सूत्र में कहा है कि वर्ग या आयत जितने पद या सेमी लम्बा तथा चौड़ा हो, उतनी रेखाएं एक-एक पद या सेमी की दूरी पर खींचें। इससे एक एक वर्ग पद (या आधुनिक 1 सेमी) के मानक मात्रक प्राप्त होंगे। उन्हें जोड़ने पर जितने मानक मात्रक प्राप्त हों, उतने वर्ग क्षेत्रफल का यह वर्ग या आयत होगा। (यावत् प्रमाणा रज्जुर्भवति तावन्तस्तावन्तो वर्गा भवन्ति, तान् समस्येत् कात्यायन शुल्व सूत्र 3.7)।
वर्ग के विकर्ण पर बनने वाला वर्ग आगे कहा गया है किसी समचतुरस्र अर्थात वर्ग (a) के विकर्ण (diagonal) पर बनने वाला वर्ग अपने पिछले वर्ग (a) के क्षेत्रफल से दुगुने क्षेत्रफल वाला होता है। (समचतुरस्रस्याक्ष्याया रज्जुर्दिस्तावती भूमिं करोति । (बौधायन शुल्व सूत्र 1.45) इसका कारण यह बताया गया है कि इस वर्ग (a) पर बनने वाले विकर्ण का प्रमाण a गणित द्विकरणी या 2 का वर्गमूल अर्थात a√2 होता है। इसे इस प्रकार सिद्ध करते है :
वर्ग जिसकी भुजा 'a' है, उस का विकर्ण √a² + a² √2a² = a²x2=a√2
इस प्रकार यदि यह विकर्ण a√2 है तो इस पर इसी प्रमाण की भुजाओं द्वारा निर्मित वर्ग का क्षेत्रफल पिछले a वर्ग से दुगुना होगा ।
समकोण त्रिभुज के त्रिक :-
a b c
3 4 5
5 12 13
7 24 25
(त्रिक चतुष्कयोः पञ्चिकाऽक्ष्णया रज्जुः आपस्तम्ब शुल्व सूत्र 5.0)
इस नियम के अनुसार बनने वाले त्रिक में से b सदा 1 कम होता है। इन्हें द्विगुणित तथा त्रिगुणित करने पर भी त्रिक प्राप्त किये जा सकते हैं। द्विगुणित करने पर c से b सदा 2 कम तथा त्रिगुणित करने पर यह 3 कम होता है। इन नियमों के आधार पर आगे चलकर इस गणित का बहुत विकास हुआ ।
वृत्ताकार और अण्डाकार प्राचीन भारतीय गणित में वृत्ताकार (circular) और अण्डाकार (elliptical figure) पिण्डों के नियमों का भी उल्लेख हुआ है। वेद में सूर्य के आकार को वृत्त नाम दिया गया तथा इसे चक्र के समान बताया है। चक्रं न वृत्तं व्यतीरवीविपत् (ऋग्वेद 1.155.6) वेद के एक आलंकारिक मन्त्र में कहा है कि सूर्य के इस चक्र की बदौलत सूर्य आकाश में तीव्र गति से परिभ्रमण करता है। वास्तव में सूर्य के वृत्ताकार तथा इसके फलस्वरूप इसकी तीव्र गति को देखकर ही लोगों ने बैलगाड़ी के लिये चक्र का आविष्कार किया, जो कि दुनिया की बड़ी-बड़ी उपलब्धियों में से एक है। THE PE
वेद में कालचक्र तथा पार्थिव चक्र को एक समान मानते हुए दोनों का एक ही समान विभाजन बताया है।
द्वादश प्रधयश्चक्रमेकं त्रीणि नभ्यानि क उ तच्चिकेत्
तस्मिन्त्साकं त्रिशता न शंकवोऽर्पिता षष्टिर्न चलाचलासः । ऋग्वेद 1.164.48
कालचक
पार्थिव चक
12 महीने का 1 वर्ष
12 प्रधि का 1 वृत्ताकार
30 दिन का 1 महीना
30 अंश की 1 प्रधि
अतः 30x12=360 दिन का 1 वर्ष
अतः 30x12=360 अंश का 1 वृत्त
यह सुखद है कि वेद में वर्णित 360 अंश का 1 वृत्त यह आज पूरे विश्व में मान्य है।
17 वृत्त के समतुल्य क्षेत्रफल वाला वर्ग शुल्व सूत्र में किसी वृत्त को समतुल्य क्षेत्रफल वाले वर्ग में तथा इसके व्युत्क्रम किसी वर्ग को समतुल्य क्षेत्रफल वाले वृत्त में बदलने का नियम बताया है, जो कि काफी सीमा तक सहीं उतरता है। उनके इस नियम से वृत्त के क्षेत्रफल तथा वर्ग के क्षेत्रफल के सूत्र का संकेत प्राप्त होता है तथा इस क्रम से 1 का मान ज्ञात होता है।
मण्डलं चतुरसं चिकीर्षन् विष्कम्भं पञ्चदश भागान् कृत्वा द्वावुद्धरेत् । त्रयोदशावशिष्यन्ते । आपस्तम्ब शुल्व सूत्र 3.6
इससे यह माना गया है कि किसी वृत्त के विष्कम्भ अर्थात् व्यास के 15 भाग करने पर दोनों तरफ एक एक भाग छोड़कर व्यास प्रमाण रेखा द्वारा वर्ग बनाने से उस वृत्त के क्षेत्रफल के समतुल्य वर्ग क्षेत्रफल प्राप्त होता है। इस प्रकार :
वृत्त का व्यास d होने पर समतुल्य वर्ग क्षेत्रफल की भुजा क अथवा जहाँ । वृत्त की त्रिज्या है। 13 15 13/15 * 2r
अब वृत्त के क्षेत्रफल तथा वर्ग के क्षेत्रफल के सूत्र अनुसार : (26/15 * r) ^ 2 = 676/225 * r ^ 2 = 676/900 = 0.751
1 व्यास होने पर वृत्त का क्षेत्रफल अतः pi = 3.004 13 समतुल्य वर्ग का क्षेत्रफल 15 pi * (1/2) ^ 2 =
chou 3.004 * 1/4 = 0.751 इस प्रकार 1 व्यास होने पर वृत्त का क्षेत्रफल समतुल्य वर्ग का क्षेत्रफल इस प्रकार शुल्व सूत्र का यह अभिमत सिद्ध है कि 3.004r * 2 = वृत्त का क्षेत्रफल = वास्तविकता के बहुत समीप है। 15 PEOPLE'S वर्ग क्षेत्रफल होता है। यह आकलन
बीज गणित : प्राचीन भारतीय गणित में बीज गणित का अधिक विस्तार नहीं है। बीज गणित में किसी व्यक्त राशि के द्वारा अव्यक्त राशियों का पता लगाया जाता है। विद्वानों ने इसके जो उदाहरण खोजे हैं, उसे 'ज्यामितीय बीजगणित' का नाम दिया है क्योंकि रेखा गणित के अन्तर्गत इस प्रकार की संक्रिया देखी गई है। तैत्तिरीय संहिता (6.2.4.5) में इसका एक उदाहरण प्राप्त है :
36² + 15² = 39²
इस परिच्छेद में समकोण त्रिभुज के जो त्रिक के उदाहरण दिये हैं, वे सभी इसके अन्तर्गत हैं। शुल्व सूत्र में इन त्रिकों के प्राप्त करने के नियम के संकेत दिये हैं। उनसे इस प्रकार के समीकरणों को हल किया जा सकता है:
x² + y² = a²
इस स्थिति में ये ज्यामितीय बीजगणित के उदाहरण बन जाते है।
शब्दावली
समचतुरस्र = वर्ग (Square)
आयतचतुरस्र या दीर्घचतुरस्र = आयत (rectangle)
द्विकरणी = दो का वर्गमूल (square root of two)
त्रिकरणी = तीन का वर्गमूल (square root of three)
एकतोऽणिमत् चतुरस्र = समलम्ब चतुर्भुज (trapezium)
प्रधि = वृत्त खण्ड (sector of a circle)
विष्कम्भ = व्यास (diameter)
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