सम्पादकीय
सभ्यता के विकास की यात्रा में "कितने" का बोध मानव मन को गणना की ओर प्रेरित करने लगा, प्रत्यक्ष से अव्यक्त की गणनात्मक संकल्पना और उन पर अलग-अलग प्रक्रियाओं से संबंधों को समझकर नई संभावनाओं को ढूंढ निकालने के प्रयास किए गए। अंक, प्रतिमान और तर्क के पारस्परिक संबंधों के विधिवत् अध्ययन को "गणित" कहा जाने लगा। अंकगणित, बीजगणित, रेखागणित, ज्यामिति आदि गणित की विविध शाखाओं का विकास हुआ।
ग्रीक, मिस्र, चाइना, रोमन, इस्लामिक गणित विधाओं का विकास हुआ। 15वीं सदी से यूरोपीय गणित का विकास तेजी से हुआ। प्रिंटिंग मशीन का आविष्कार हो जाने से, गणित में पुस्तकें लिखी गई, प्रिंट हुई और शिक्षा में जुड़ी। भारत में गणित वर्ष 1000 ईसा पूर्व वैदिक काल में विकसित स्तर पर था। शून्य अंक और दशमल प्रणाली का विकास हुआ। जोड़. बाकी, गुणा, भाग, वर्ग, घन, वर्गमूल, घनमूल आदि अंकीय प्रक्रियों का उल्लेख वैदिक साहित्य में मिलता है।
शुल्ब सूत्र और उपसूत्रों से अंक, बीज, और ज्यामिति गणित प्रक्रियाओं को पैटर्न पहचान कर आसानी से किया जा सकता है। पाइथागोरस थ्योरेम का उल्लेख शुल्ब सूत्रों के माध्यम से मिलता है। मान लो पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी एक यूनिट है और सूर्य और चन्द्रमा पृथ्वी के सापेक्ष 1/7 अंश का कोण बनाते हैं तो चंद्रमा की अपेक्षा सूर्य पृथ्वी से 400 गुणा दूर होगा। 7 (पाई) का मान दिया गया। 1/x का मान x के शून्य के करीब होने पर पर इंफिनिटी अनंत होता है। भास्कराचार्य और आर्यभट्ट प्रसिद्ध गणितज्ञ थे। यूरोप में 16वीं सदी से आधुनिक गणित का तेजी से विकास हुआ। अंकगणितीय प्रक्रियाओं के मानक स्वरूप दिए गए। गैलेलियो, केप्लर, नेपिअर, लाप्लास, न्यूटन, लीब्निज, डेकाटे, फर्मेट, पास्काल, बर्नोली, ऑयलर, यूक्सिड गौस, रीमान, बूल, केन्टर, हार्डी, हिल्बर्ट, गॅडल, ट्यूरिंग, आदि गणितज्ञों का उल्लेखनीय योगदान रहा। 20वीं सदी में एच.जी. हार्डी के साथ श्रीनिवास रामानुजन का नाम भी जुड़ जाता है। अंतरराष्ट्रीय गणित संघ (IMU: International Mathematical Union) गणित में शोध को प्रोत्साहन देने के लिए चुनिंदा गणितज्ञों को Fields Medal से सम्मानित करती है।
आजकल स्कूल और कॉलेज स्तर पर विद्याथियों में गणित के प्रति अभिरूचि कम होती जा रही है। मोबाइल, लैपटॉप के बढ़ते प्रयोग से गणितीय कौशल का अभाव महसूस हो रहा है। नवाचार और अनुसंधान के क्षेत्र में विज्ञान की विविधता को समझने और नव नवीन टैक्नोलॉजी के विकास में गणितीय कौशल की प्रधानता रहती है। सुझाव है कि भौतिकी की तरह Maths Lab गणित प्रयोगशाला बने। गणित-प्रयोग पाठ्यक्रम में अनिवार्य अंग हों। मोडलिंग और सिमुलेशन से प्रक्रिया, परिणाम और संभव उत्पाद को कम अधिक करके समझा और समझाया जा सकता है। सुदृढ़ नियंत्रण प्रणाली से रोबोट सर्जरी कर सकता है, मिसाइल प्रक्षेपण और मिसाइल से मिसाइल भेदन संम्भव है, चंद्रमा मंगल पर यान पहुँचाना संभव हैं। इन सबको करने के लिए गणित के प्रति अभिरूचि जगाने के उद्देश्य से आलेख प्रस्तुत हैं। पाठको से निवेदन है कि लोक भाषा में विज्ञान, टैक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और गणित के क्षेत्र में योगदान करें और अन्य मित्रों को भी आलेख लिखने के लिए प्रेरित करें ।
राम चौधरी
श्रीनिवास रामानुजन एक विलक्षण गणितज्ञ
Shri Niwas Ramanujan - An Extraordinary Mathematician
By
डॉ. कृष्ण कुमार मिश्र
रीडर (एफ), होमी भाभा विज्ञान शिक्षा केन्द्र, टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान, वी.एन. पुरव मार्ग, मानखुर्द, मुम्बई-400088 ई-मेल : kkm@hbcse.tifr.res.in
सारांश
यह महान भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन के जीवन और कार्य का एक संक्षिप्त लोकप्रिय वृत है। रामानुजन 20वी शताब्दी की एक महान गणितीय प्रतिभा थे; एक स्व-प्रयास द्वारा शिक्षित व्यक्ति जिसकी गणित में रूचि इतनी गहरी थी कि उसने इसके लिए सब कुछ न्यौछावर कर दिया अपना परिवार, अपना स्वास्थ्य और अपना जीवन। जन्म से निष्ठावान ब्राह्मण रामानुजन ने अपनी जीवनशैली और विचारधारा को लेकर कभी कोई समझौता नहीं किया और दीप्ति के शिखर पर पहुँचने से पहले ही अपने जीवन दीप को बुझ जाने दिया। रामानुजन की जीवन लीला अल्पायु में ही समाप्त हो गई किन्तु उन्होंने अपने पीछे लगभग 4000 प्रमाणरहित सूत्रों और प्रमेयों की विरासत तीन नोटबुकों के रूप में छोड़ी जिनके प्रमाण प्रस्तुत करने में विश्व के महान गणितीय मस्तिष्कों को कई दशक लगे। प्रत्येक भारतीय को भारत के इस महान सपूत से प्रेरणा लेनी चाहिए।
ABSTRACT
This is a brief popular account of the life and work of the great Indian Mathematician Shriniwas Ramanujan. He was a great mathematical genius of twentieth century; a self taught man who had so great a passion for mathematics that he sacrified everything for it: his family, his health and his life. An orthodox brahmin by birth he did not compromise on his life style and ideology and let the lamp of his life get extinguished before it could shine with its full brightness. Ramanujan died young but he left a legacy of about 4000 formulae and theorems without giving proof in three diaries, which took decades of efforts to prove by the great mathematical minds of the world. Every Indian shall take inspiration from the life of this great son of India.
भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन
भारत सरकार द्वारा वर्ष 2012 को राष्ट्रीय गणित वर्ष घोषित किया गया है। यह वर्ष सुविख्यात भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन के जन्म का 125वाँ वर्ष है। वैसे हमारे देश में गणित तथा खगोल विज्ञान में अनुसंधान की एक समृद्ध परम्परा रही है। इसे पूरी दुनिया स्वीकार करती है। लेकिन भास्कराचार्य (सन् 1150) के बाद यह परम्परा अवरुद्ध-सी हो गयी थी। इस परंपरा को बीसवीं शताब्दी में रामानुजन ने बखूबी आगे बढ़ाया।
रामानुजन का जन्म 22 दिसम्बर 1887 को मद्रास से 400 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित ईरोड नामक एक छोटे से गांव में हुआ था। रामानुजन जब बहुत छोटे रहे होंगे उसी समय उनका परिवार ईरोड से कुम्भकोण ाम आ गया। वे एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता कुम्भकोणम में एक कपड़ा व्यापारी के यहां मुनीम का काम करते थे। जब वे पांच वर्ष के थे तो उनका दाखिला कुम्भकोणम के प्राइमरी स्कूल में करा दिया गया। सन् 1898 में इन्होंने टाउन हाईस्कूल में प्रवेश लिया और सभी विषयों में बहुत अच्छे अंक प्राप्त किए।
यहीं पर रामानुजन को जी. एस. कार की गणित पर लिखी किताब पढ़ने का मौका मिला। इस पुस्तक से प्रभावित होकर उन्होंने स्वयं ही गणित पर कार्य करना प्रारंभ कर दिया।
रामानुजन धार्मिक प्रवृत्ति और शांत स्वभाव के एक चिन्तनशील बालक थे। अपने खपरैल की छत वाले पैत्रिक मकान के सामने एक ऊंचे चबूतरे पर बैठकर वे गणित के सवाल हल करते रहते थे। रामानुजन का गणित के प्रति जबर्दस्त लगाव था। विशुद्ध गणित के अतिरिक्त अन्य विधाओं मसलन गणितीय भौतिकी और अनुप्रयुक्त गणित में उनकी रुचि नहीं थी। रामानुजन गणित की खोज को ईश्वर की खोज की तरह मानते थे। इसी कारण गणित के प्रति उनमें गहरा लगाव था। उनका मानना था कि गणित से ही ईश्वर का सही स्वरूप स्पष्ट हो सकता है। वे संख्या 'एक' को अनन्त ईश्वर का स्वरूप मानते थे। वे रातदिन संख्याओं के गुणधर्मों के बारे में सोचते, मनन करते रहते थे और सुबह उठकर कागज पर अकसर सूत्र लिख लिया करते थे। उनकी स्मृति और गणना शक्ति अद्भुत थी। वे π, √2, 8 आदि संख्याओं के मान दशमलव के हजारवें स्थान तक निकाल लेने में सक्षम थे। यह उनकी गणितीय मेधा का प्रमाण है।
रामानुजन जब दसवीं कक्षा के छात्र थे तो उन्होंने स्थानीय कॉलेज के पुस्तकालय से उच्च गणित में जार्ज शुब्रिज कार का एक ग्रन्थ "सिनॉप्सिस आफ प्योर मैथेमैटिक्स" प्राप्त किया। इस ग्रन्थ में बीजगणित, ज्यामिति, त्रिकोणमिति और कलन गणित के 6165 सूत्र दिये गये हैं। इनमें से कुछ सूत्रों की बहुत संक्षिप्त उपपत्तियां भी दी गई हैं। यह ग्रन्थ रामानुजन के लिए उच्च गणित का बहुत बड़ा खजाना था। वे गम्भीरता से इस ग्रन्थ के प्रत्येक सूत्रों को हल करने में जुट गये और इन सूत्रों को सिद्ध करना उनके लिए गवेषणा का कार्य बन गया। उन्होंने पहले मैजिक स्क्वायर तैयार करने की कुछ विधियाँ खोज निकालीं। रामानुजन ने समाकलन का अच्छा ज्ञानार्जन कर लिया। बीजगणित की कई नई श्रेणियां उन्होंने खोज निकालीं। उनके गुरु डॉ. हार्डी का कथन काबिलेगौर है-"इसमें संदेह नहीं है कि इस ग्रन्थ ने रामानुजन को बेहद प्रभावित किया और उनकी संपूर्ण क्षमता को जगाया। यह ग्रन्थ उत्कृष्ट कृति नहीं है परन्तु रामानुजन ने इसे सुप्रसिद्ध कर दिया। इसके अध्ययन के बाद ही एक गणितज्ञ के रूप में रामानुजन के जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ।"
कुम्भकोणम के शासकीय महाविद्यालय में अध्ययन के लिए रामानुजन को छात्रवृत्ति मिलती थी। परंतु रामानुजन द्वारा गणित के अलावा दूसरे विषयों की अनदेखी करने पर उनकी छात्रवृत्ति बंद हो गई। सन् 1905 में रामानुजन मद्रास विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में सम्मिलित हुए परंतु गणित को छोड़कर बाकी सभी विषयों में वे अनुत्तीर्ण हो गए। सन् 1906 एवं 1907 की प्रवेश परीक्षा का भी यही परिणाम रहा। आगे के वर्षों में कार की पुस्तक को मार्गदर्शक मानते हुए रामानुजन गणित में कार्य करते रहे और अपने परिणामों को लिखते गए जो "नोटबुक" नाम से सुप्रसिद्ध हुए। रामानुजन को प्रश्न पूछना बहुत पसंद था। उनके प्रश्न अध्यापकों को कभी-कभी अटपटे लगते थे। मसलन कि संसार में पहला पुरुष कौन था? पृथ्वी और बादलों के बीच की दूरी कितनी होती है? वगैरह।
रामानुजन का व्यवहार बड़ा ही मधुर था। सामान्य से कुछ ज्यादा ही कृशकाय, और जिज्ञासा से चमकती आखें इन्हें एक अलग पहचान देती थीं। इनके सहपाठियों के अनुसार इनका व्यवहार इतना सौम्य था कि कोई इनसे नाराज हो ही नहीं सकता था। विद्यालय में इनकी प्रतिभा ने दूसरे विद्यार्थियों और शिक्षकों पर छाप छोड़ना आरंभ कर दिया। इन्होंने स्कूल के समय में ही कालेज स्तर के गणित का अध्ययन कर लिया था। एक बार इनके विद्यालय के हेडमास्टर ने कहा भी कि विद्यालय में होने वाली परीक्षाओं के मापदंड रामानुजन के लिए लागू नहीं होते। हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद इन्हें गणित और अंग्रेजी में अच्छे अंक लाने के कारण "सुब्रमण्यम छात्रवृत्ति" मिली और आगे कालेज की शिक्षा के लिए प्रवेश भी मिला।
जी.एच. हार्डी
वर्ष 1909 में रामानुजन दांपत्य जीवन में बंध गए। फिर उन्हें रोजी रोटी की फिक्र होने लगी। फलतः उन्होंने नौकरी ढूँढ़नी शुरू की। नौकरी की खोज के दौरान रामानुजन कई प्रभावशाली व्यक्तियों के सम्पर्क में आए। "इंडियन मैथमैटिकल सोसायटी" के संस्थापकों में से एक रामचंद्र राव भी उन्हीं प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक थे। रामानुजन ने रामचंद्र राव के साथ एक साल तक कार्य किया। इसके लिए उन्हें 25 रुपये महीना मिलता था। इन्होंने "इंडियन मैथमैटिकल सोसायटी" के जर्नल के लिए प्रश्न एवं उनके हल तैयार करने का कार्य प्रारंभ कर दिया। सन् 1911 में बर्नोली संख्याओं पर प्रस्तुत शोधपत्र से इन्हें बहुत प्रसिद्धि मिली और मद्रास में गणित के विद्वान के रूप में पहचाने जाने लगे। सन् 1912 में रामचंद्र राव की सहायता से मद्रास पोर्ट ट्रस्ट के लेखा विभाग में लिपिक की नौकरी करने लगे।
रामानुजन ने गणित में शोध करना जारी रखा और 8 फरवरी सन् 1913 में इन्होंने जी. एच. हार्डी को पत्र लिखा। साथ में स्वयं के द्वारा खोजे प्रमेयों की एक लम्बी सूची भी भेजी। ये पत्र हार्डी को सुबह नाश्ते के वक्त मेज पर मिले। इस पत्र में एक अनजान भारतीय द्वारा बहुत सारे बिना उपपत्ति के प्रमेय लिखे थे जिनमें से कई प्रमेय हार्डी देख चुके थे। पहली नजर में हार्डी को ये सब बकवास लगा। उन्होंने इस पत्र को किनारे रख दिया और अपने काम में लग गए। परंतु इस पत्र की वजह से उनका मन अशांत था। इस पत्र में बहुत सारे ऐसे प्रमेय थे जो उन्होंने न कभी देखे थे, और न सोचे थे। उन्हें बार-बार यह लग रहा था कि यह व्यक्ति (रामानुजन) या तो धोखेबाज है या फिर गणित का बहुत बड़ा विद्वान। रात को 9 बजे हार्डी ने अपने एक शिष्य लिटिलवुड के साथ एक बार फिर इन प्रमेयों को देखना शुरू किया तथा देर रात तक वे लोग समझ गये कि रामानुजन कोई धोखेबाज नही बल्कि गणित के बहुत बड़े विद्वान हैं जिनकी प्रतिभा को दुनिया के सामने लाना आवश्यक है। इसके बाद हार्डी ने उन्हें कैम्ब्रिज बुलाने का फैसला किया। हार्डी का यह निर्णय एक ऐसा निर्णय था जिससे न केवल उनकी, बल्कि गणित की ही दिशा बदल गई।
सन् 1914 में हार्डी ने रामानुजन के लिए कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज आने की व्यवस्था की। रामानुजन को गणित की कुछ शाखाओं का बिलकुल भी ज्ञान नहीं था, पर कुछ क्षेत्रों में उनका कोई सानी नहीं था। इसलिए हार्डी ने रामानुजन को पढ़ाने का जिम्मा स्वयं लिया। सन् 1916 में रामानुजन ने कैम्ब्रिज से बी.एस सी. की उपाधि प्राप्त की। सन् 1917 से ही रामानुजन बीमार रहने लगे थे और अधिकांश समय बिस्तर पर ही रहते थे। बीमारी की एक वजह थी। रामानुजन ब्राह्मण कुल में पैदा हुए थे तथा खानपान के मामले में बहुत परहेज रखते थे। वे पूर्णतः शाकाहारी थे और इंग्लैण्ड में रहते हुए अपना भोजन स्वयं पकाते थे। इंग्लैण्ड की कड़ाके की सर्दी और उस पर कठिन परिश्रम। इसी से उनकी सेहत गिरती गयी। उनमें जब तपेदिक के लक्षण दिखाई देने लगे तो उन्हें अस्पताल में भर्ती कर दिया गया। इधर उनके लेख उच्चकोटि की पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगे थे। सन् 1918 में एक ही वर्ष में रामानुजन को कैम्ब्रिज फिलोसॉफिकल सोसायटी, रॉयल सोसायटी तथा ट्रिनिटी कॉलेज कैम्ब्रिज, तीनों का फैलो चुना गया। उस समय उनकी उम्र महज 30 साल थी। इससे रामानुजन का उत्साह और भी अधिक बढ़ा और वह काम में जी-जान से जुट गए। लेकिन सन् 1919 में स्वास्थ्य ज्यादा खराब होने की वजह से उन्हें भारत वापस लौटना पड़ा।
एक बार की बात है। रामानुजन अस्पताल में भर्ती थे। डॉ. हार्डी उन्हें देखने टैक्सी से अस्पताल आए। टैक्सी का नंबर 1729 था। रामानुजन से मिलने पर डॉ. हार्डी ने ऐसे ही सहज भाव से कह दिया कि यह एक अशुभसंख्या है। बात यह थी कि 1729 = 7 × 13 × 191 यहाँ आप देखेंगे कि 1729 का एक गुणनखंड 13 है। यूरोप के अंधविश्वासी लोग इस 13 संख्या से बहुत भय खाते हैं। वे संख्या 13 को बहुत अशुभ मानते हैं। वे 13 संख्यावाली कुर्सी पर बैठने से बचेंगे, 13 संख्यावाले कमरे में ठहरने से बचेंगें। इसलिए डॉ. हार्डी ने रामानुजन से कहा था कि 1729 एक अशुभ संख्या है। लेकिन रामानुजन ने झट जवाब दिया नहीं, यह एक अद्भुत संख्या है। वास्तव में यह वह सबसे छोटी संख्या है जिसे हम दो घन संख्याओं के जोड़ द्वारा दो तरीकों से व्यक्त कर सकते है। जैसे 1729 = 12³ + 1³ तथा 1729 = 10³ + 9³
इलिनॉय विश्वविद्यालय के गणित के प्रोफेसर ब्रुस सी. बर्नाड्ट ने रामानुजन की तीन पुस्तकों पर 20 वर्षों तक शोध किया और उनके निष्कर्ष पाँच पुस्तकों के संकलन के रूप में प्रकाशित हुए हैं। प्रो. बर्नाड्ट कहते हैं. "मुझे यह सही नहीं लगता जब लोग रामानुजन की गणितीय प्रतिभा को किसी दैवीय या आध्यात्मिक शक्ति से जोड़ कर देखते हैं। यह मान्यता ठीक नहीं है। उन्होंने बड़ी सावधानी से अपने शोध निष्कर्षों को अपनी पुस्तिकाओं में दर्ज किया है।" सन् 1903 से 1914 के दरम्यान कैम्ब्रिज जाने से पहले रामानुजन अपनी पुस्तिकाओं में 3,542 प्रमेय लिख चुके थे। उन्होंने ज्यादातर अपने निष्कर्ष ही दिए थे, उनकी उपपत्ति नहीं दी। शायद इसलिए कि वे कागज खरीदने में सक्षम नहीं थे और अपना कार्य पहले स्लेट पर करते थे। बाद में बिना उपपत्ति दिए उसे पुस्तिका में लिख लेते थे।
ट्रिनिटी कॉलेज
किसी संख्या के विभाजनों की संख्या ज्ञात करने के फार्मूले की खोज रामानुजन के प्रमुख गणितीय कार्यों में एक है। उदाहरण के लिए संख्या 5 के कुल विभाजनों की संख्या 7 है। इस प्रकार: 5, 4+1, 3+2, 3 + 1 + 1, 2 + 2 + 1 , 2 + 1 + 1 + 1 , 1 + 1 + 1 + 1 + 1 रामानुजन के फार्मूले से किसी भी संख्या के विभाजनों की संख्या ज्ञात की जा सकती है। उदाहरण के लिए संख्या 200 के कुल 3972999029388 विभाजन होते हैं। हाल ही में भौतिक जगत की नयी थ्योरी "सुपरस्ट्रिंग थ्योरी" में इस फार्मूले का काफी उपयोग हुआ है। रामानुजन ने उच्च गणित के क्षेत्रों जैसे संख्या सिद्धान्त, इलिप्टिक फलन, हाईपरज्योमैट्रिक श्रेणी इत्यादि में अनेक महत्वपूर्ण खोज की। रामानुजन ने वृत्त की परिधि और व्यास के अनुपात 'पाई' (ग) के अधिक से अधिक शुद्ध मान प्राप्त करने के अनेक सूत्र प्रस्तुत किए हैं। ये सूत्र अब कम्प्यूटर द्वारा के दशमलव के लाखों स्थानों तक परिशुद्ध मान ज्ञात करने के लिए कारगर सिद्ध हो रहे हैं। आज दुनिया के सुपरकम्प्यूटरों की क्षमता प्रायः इस परीक्षण से आंकी जाती है कि वे का मान दशमलव के कितने स्थानों तक कितने अल्पकाल में प्रस्तुत कर सकते हैं।
सन् 1919 में इंग्लैण्ड से वापस आने के पश्चात् रामानुजन कुम्भकोणम में रहने लगे। उनका अंतिम समय चारपाई पर ही बीता। वे चारपाई पर पेट के बल लेटे-लेटे कागज पर बहुत तेज गति से यूँ लिखते रहते थे मानो उनके मस्तिष्क में गणितीय विचारों की आँधी चल रही हो। रामानुजन स्वयं कहते थे कि उनके द्वारा लिखे सभी प्रमेय उनकी कुलदेवी नामगिरि की प्रेरणा हैं। उनका स्वास्थ्य उत्तरोत्तर गिरता गया जो चिंता का विषय था। यहां तक कि डॉक्टरों ने भी जवाब दे दिया था। आखिरकार एक दिन रामानुजन के जीवन की सांध्यवेला आ ही गई। 26 अप्रैल 1920 की सुबह वे अचेत हो गए, और दोपहर होते-होते उनका देहावसान हो गया। इतनी अल्पायु में उनके असामयिक निधन से गणित जगत की अपूरणीय क्षति हुई।
उनके देहावसान के बाद मॉक थीटा फंक्शन से सम्बन्धित उनकी "नोटबुक" मद्रास विश्वविद्यालय में जमा थी, प्रो. हार्डी के जरिए डॉ. वाटसन के पास पहुँची। तदोपरान्त रामानुजन की यह 130 पृष्ठों की नोटबुक ट्रिनिटी कालेज के ग्रन्थालय को सौंपी गई। इस "नोटबुक" में रामानुजन ने जल्दी-जल्दी में लगभग 600 परिणाम प्रस्तुत किए थे लेकिन उनकी उपपत्तियां नहीं दी थीं। विस्कोन्सिन विश्वविद्यालय के गणितज्ञ डॉ. रिचर्ड आस्की लिखते है-"मृत्युशैया पर लेटे-लेटे साल भर में किया गया रामानुजन का यह कार्य बड़े-बड़े गणितज्ञों के जीवनभर के कार्य के बराबर है। सहसा यकीन नहीं होता कि उन्होंने अपनी उस दशा में यह कार्य किया। कदाचित किसी उपन्यास में ऐसा विवरण दिया जाता तो उस पर कोई भी यकीन न करता।"
रामानुजन की मृत्यु के 37 वर्ष बाद 1957 में टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान (TIFR) मुंबई ने तीनों नोटबुकों की फोटो कॉपी का पहला संस्करण दो बड़ी जल्दिों में प्रकाशित किया। रामानुजन की नोट बुकों के प्रकाशन के बाद देश-विदेश के गणितज्ञों ने उसमें निहित 4000 सूत्रों तथा प्रमेयों पर खोजबीन शुरू की। उनकी नोटबुकों की यह अमूल्य विरासत गणितज्ञों के लिए शोध तथा रुचि का विषय है। रामानुजन विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। संख्या सिद्धान्त पर उनके आश्चर्यजनक कार्य के लिए अकसर उन्हें "संख्याओं का जादूगर" कहा जाता है। उन्होंने महज 32 वर्ष 4 माह की कुल उम्र पायी लेकिन इतनी ही अवधि में किया गया उनका कार्य विस्मयकारी है। उनके इस महान गणितीय योगदान के लिए रामानुजन को अकसर "गणितज्ञों का गणितज्ञ" भी कहा जाता है।
क्या आप जानते हैं?
30 नवम्बर, 1858 को पूर्वी बंगाल के मैमन सिंह जिला के रारीखल गांव में जन्में डॉ. जगदीशचंद्र बोस भौतिकी में "विद्युत तरंगों" के लिए तथा वनस्पति विज्ञान में 'पौधों में जीवन' की अपनी खोजों एवं प्रयोगों के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्होंने जीव और निर्जीव के परस्पर सम्बंध पर शोध कार्य किया। विद्युत चुम्बकीय तरंगों से सम्बंधित उनकी खोजें हर्ट्ज तथा मार्कोनी की खोजों से कहीं अधिक उच्च स्तर की थीं। उन्होंने क्रिस्कोग्राफर पर पौधों पर गर्मी, विद्युत के झटकों तथा रसायनों के प्रभावों को दर्शाया।
श्रीनिवास रामानुजन का जीवन और आध्यात्म Shri Niwas Ramanujan - Life and Spirituality
प्रो. भूदेव शर्मा वं प्रो. नरेन्द्र कुमार गोविल
Professor Bhu Dev Sharma,
K-122, Kavinagar Ghaziabad (U.P.)
bhudev_sharma@yahoo.com
Professor, Narendra Kumar Govil,
Department of Mathematics & Statistics Auburn University, Auburn,
AL 36849, USA, govilnk@auburn.edu
सारांश
रामानुजन पश्चिमी जगत के लिए एक रहस्यमय ईश्वरीय रचना थे। उनके लिए यह समझना कठिन था कि रामानुजन गणित की जटिल समस्याओं के सरल हल आसानी से कैसे ढूंढ निकालते थे? रामानुजन स्वयं अपनी बौद्धिक देन का सम्पूर्ण श्रेय अपनी कुलदेवी नामगिरि को देते थे। रामानुजन इस तथ्य के जीते जागते उदाहरण हैं कि केवल नैतिक और आध्यात्मिक सिद्धान्तों का ही प्रकरण पैगम्बरों के माध्यम से हो यह जरूरी नहीं है, विज्ञान और गणित के सिद्धान्तों का सहज बोध भी उन लोगों को हो सकता है जो उनकी तलाश में सत्यनिष्ठा से अपने को समर्पित करते हैं।
ABSTRACT
Ramanujan was a phenomenon to the western world. It was difficult for them to understand how he could work out simple solutions to most intricate mathematical problems so easily. Ramanujan himself used to give the full credit of his intellectual outcomes to his family deity Namgiri. Ramanujan is a living example of the fact that it is not the moral and spiritual principles revealed to prophets, scientific and mathematical principles can also be revealed to those who devote themselves in that endeavour.
किसी भी विषय में ख्याति पाने के साथ असाधारण प्रतिभा से विभूषित व्यक्ति बहुत ही कम होते हैं। समय के साथ ओझल होना भी नियम ही है। परन्तु विश्व गणित मण्डल के उज्जवल नक्षत्र अप्रतिम ख्याति के धनी श्रीनिवास रामानुजन इस नियम के अपवाद हैं। केवल 33 वर्ष की अल्प आयु पाने वाले एवं दरिद्रता के स्तर पर विवशताओं के मध्य पराधीन भारत में पले-बढ़े रामानुजन ने गणित पर अपनी शोधों तथा उनके पीछे छिपी अपनी विलक्षणता की जो छाप छोढ़ी है उसको जानकर किसी को भी आश्चर्य होना स्वाभाविक है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि उन जैसे व्यक्ति संसार में कभी-कभी ही जन्म लेते हैं।
उनके जीवन में झाँकना तथा उनके कार्य से अवगत होना एक दिव्य विभूति के निकट जाने जैसा है। यदि
आज कृष्ण गीता के दसवें अध्याय के 'विभूति-योग' में अर्जुन को अपने विषय में बोध कराते तो यह अवश्य कहते "गणितज्ञानां अहं रामानुजन अस्मि अर्थात् गणितज्ञों में मैं रामानुजन हूँ।"
रामानुजन की मन्दिर एवं पूजा आदि में प्रगाढ़ अभिरुचि थी। नामगिरी देवी के प्रति उनके परिवार एवं उनके विशेष अनुराग के उल्लेख के बिना उनको समझना सम्भव नहीं है। वह अन्त तक नामगिरी देवी को ही अपने शोध कार्य एवं सूत्रों की प्रदायिनी बताते रहे। इसलिए उनके जीवन में अध्यात्म एक विशेष स्थान रखता है। उन्होंने, परिवार के परिवेश में, रामायण, महाभारत की कहानियाँ बड़े मनोयोग से सुनी-पढ़ी थीं और कदाचित उपनिषदों में उठाए कठिन प्रश्नों के उत्तर एवं उनके पौराणिक समाधानों को आत्मसात किया था।
अंग्रेजी में उनकी जीवनी लिखने वाले रॉर्बट कैनिगेल का कहना है कि रामानुजन का आध्यात्मिक पक्ष बड़ा प्रबल था। अपने कॉलेज जीवन के दौरान उन्होंने एक बीमार बच्चे के माता-पिता को बच्चे के स्थान परिवर्तन की सलाह इसलिए दी थी कि उनका मानना था कि मृत्यु पूर्व निश्चित स्थान एवं समय के संयोग के बिना नहीं होती। और स्थान परिवर्तन से उसे स्वास्थ्य लाभ हो सकता था। इसके अतिरिक्त एक बार स्वप्न में उन्होंने एक हाथ को लहू से सने लाल पट पर इलिप्टिक को बनाते हुए देखा था। गणित के इल्पिटिक फंक्शनों पर उनका काफी कार्य है।
अंकों में वह रहस्य एवं अध्यात्म देखते थे। वह सत्ता को शून्य और अनन्त के रूप में कल्पित करते थे। उनके विचार से शून्य पूर्ण सत्य का निर्विकार प्रतिरूप है और अनन्त उस पूर्ण सत्य से प्रक्षेपित विचित्र सृष्टि। गणित का थोड़ा-सा ज्ञान रखने वाले व्यक्ति भी यह जानते हैं कि कुछ संख्याओं को गणित में अनिश्चित (Indeterminate) माना जाता है, और उनका मान विभिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग होता है। ऐसी एक स्थिति 0 × ∞ अर्थात् शून्य एवं अनन्त के गुणा की भी है। यह गणित में अनिश्चित है, इसका फल कोई भी संख्या हो सकती है। रामानुजन इसे ब्रह्म एवं सृष्टि से जोड़ते थे। अर्थात् ब्रह्म एवं सृष्टि के गुणन से कोई भी फल (अंक अथवा संख्या) प्राप्त हो सकता है।
अंकों के रहस्य को वह काफी आगे तक सोचते थे। अपने एक मित्र को उन्होंने संख्या 2"-1 के बारे में बड़ी रोचक बातें बतलाई थीं। उनके अनुसार यह संख्या आदि ब्रह्म, विभिन्न दैवी एवं अन्य आध्यात्मिक शक्तियों का निरूपण करती है। जब n = 0 है तब यह संख्या शून्य है, जिसका अर्थ है अनित्यता, जब n = 1 तब इसका मान 1 है, अथवा आदि ब्रह्म, और जब n=2 है, तब इसका मान 3 त्रिदेवों को प्रस्तुत करता है, तथा n = 3 लेने पर इसका मान 7. सप्त ऋषियों को। 7 की संख्या को वह अंकों के रहस्यवाद की दृष्टि से काफी महत्त्व की मानते थे।
भारत में लगभग सभी व्यक्ति प्रोफेसर पी.सी. महालनबीस के नाम से परिचित होंगे। उन्होंने कलकत्ता में 'इंडियन स्टेटिस्टिकल इंस्टीट्यूट' की स्थापना की थी तथा भारत के स्वतंत्र होने पर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें सर्व प्रथम योजना आयोग का कार्य सौंपा था। रामानुजन के समय में प्रशान्त चन्द्र महालनबीस इंग्लैण्ड में किंग्स
कॉलेज में विद्यार्थी थे। बाद में वह रायल सोसाइटी के फेलो मनोनीत हुए थे। इंग्लैंड में कैम्ब्रिज वास के समय रामानुजन की भेंट श्री महालनबीस से हुई और वह दोनों भारतीय बहुधा मिलकर बातें किया करते थे। महालनबिस का कहना था कि रामानुजन दार्शनिक प्रश्नों पर इतने उत्साह से बोलते थे, कि मुझे लगता कि उन्हें गणित के सूत्रों को जी-जान से सिद्ध करने में लगने के स्थान पर अपने दार्शनिक सूत्रों के प्रतिपादन में लगना चाहिए था।
रामानुजन का अपने एक मित्र से यह कथन कि 'यदि कोई गणितीय समीकरण अथवा सूत्र किसी भगवत् विचार से उन्हें नहीं भर देता तो वह उनके लिए निरर्थक है' उनके उत्कृष्ट आध्यात्म का परिचायक है। उनका जीवन भारतीय आध्यात्मिक परम्परा के अनुरूप पूर्ण समर्पण का था-गणि ात में ब्रह्म का, आत्मा का एवं सृष्टि के साक्षात करने का।
सत्य तर्क का विषय नहीं होता, परन्तु तर्क के विपरीत भी नहीं होता। जो सत्यदृष्टा रहस्य और तर्क में सामंजस्य स्थापित करने में सफल हो जाता है, भारतीय परम्परा में वह ऋषि है। एक ऋषि की भाँति वह अपने सूत्रों के दृष्टा थे, जिनको उन्होंने अपनी तार्किक बुद्धि से प्रतिपादित अथवा सिद्ध किया।
शोध को वैज्ञानिक दो भाग में बाँटते आए हैं-खोज (डिस्कवरी) अथवा अविष्कार (इन्वेंशन)। खोज में गुप्त को प्रकट करने की प्रक्रिया होती है और अविष्कार में नए सृजन की। एक रहस्योद्घाटन की प्रक्रिया है और दूसरा वैचारिक विश्लेषण का परिणाम। रामानुजन को बहुत निकट से जानने वाले, प्रो. हार्डी ने उनके कार्य को सृजन प्रक्रिया की देन मान कर सराहा है। कैनिगेल ने उनकी जीवनी पर लेखनी उठाने से पूर्व उनके व्यक्तित्व एवं मानसिक-सामाजिक परिवेश का गहन अध्ययन किया है। वह उनके दिए सूत्रों को खोज की श्रेणी में रखकर उनके आध्यात्मिक पक्ष को प्रबल मानते हैं। क्लिष्ट सूत्रों का त्रुटि-हीन प्रतिपादन हार्डी के विश्वास का आधार है तो ऐसे बहुत से क्लिष्ट सूत्र जिनका प्रतिपादन वह अपने जीवन में नहीं दे पाए और उनमें से कुछ पर बाद में कार्य चला और चल रहा है, कैनीगेल की धारणा को दृढ़ करते हैं। वास्तविकता यह है कि उनमें दोनों ही पक्ष-आध्यात्मिक रहस्यवाद एवं विश्लेषणत्मक बुद्धि का अनोखा संगम था।
प्रोफेसर हार्डी के अनुसार रामानुजन सरल प्रकृति के हँसमुख व्यक्ति थे। वह कहानियाँ तथा चुटकुले सुनाने में रुचि लेते थे। गणित के साथ अपने इंग्लैंड वास के समय वह राजनैतिक विषयों पर भी रुचि से चर्चा करते थे।
रामानुजन संख्या : 1729
Ramanujan Number 1729
डॉ. चिन्मय कुमार घोष
Dr. Chinmay Kumar Ghosh
निदेशक, एन.सी.आई.डी.ई. इग्नू, मैदान गढ़ी नई दिल्ली-110068
सारांश
यह संक्षिप्त लेख रामानुजन संख्या 1729 के कुछ विशेष पहलुओं को उजागर करता है।
ABSTRACT
This brief article on Ramanujan Number highlights some special aspects of the number 1729.
रामानुजन संख्याः 1729
रामानुजन एक प्रकार से संख्याओं के जादूगर थे। संख्याओं के साथ उनका गहरा संबंध था। हम कह सकते हैं कि वे संख्याओं के साथ खेलते थे। इसकी सबसे बड़ी मिसाल है संख्या '1729' जिसे रामानुजन संख्या कहा जाता है। श्रीनिवास रामानुजन जब इंग्लैंड में थे तो अक्सर बीमार रहते थे। उनके परामर्शदाता जी.एच.हार्डी ने, न केवल उनकी प्रतिभा को दुनिया के सामने लाने में निर्णायक भूमिका निभाई, बल्कि उनके विदेश प्रवास के दौरान उनके स्वास्थ्य का ध्यान भी रखा। लगभग प्रतिदिन ही वह रामनुजन को ठीक से खाना खाने और नियमित रूप से दवाइयां न लेने के लिए डांटते थे। ऐसे ही एक दिन जब रामानुजन अस्पताल में थे तो हार्डी उनसे मिलने आए। हार्डी उस दिन बहुत उदास लग रहे थे। रामनुजन ने उनसे पूछा, "आप इतने परेशान क्यों लग रहे हैं, आज तो मैं अपेक्षाकृत पहले से बेहतर हूँ।"
हार्डी ने उत्तर दिया, तुम तो संख्याओं के जादूगर हो, परन्तु आज मैं जिस टैक्सी में आया हूँ मुझे उसका नंबर बहुत ही नीरस लगा। "क्या नंबर था?" रामानुजन ने पूछा। हार्डी ने कहा, "उसका नंबर था 1729। तुरंत रामानुजन ने उत्तर दिया, शायद 1729 से ज्यादा दिलचस्प संख्या तो कोई हो ही नहीं सकती। ऐसी कुछ ही संख्याएँ हैं जिन्हें दो घनों के योग के रूप में दो अलग-अलग ढंग से लिखा जा सकता है और 1729 उनमें सबसे छोटी संख्या है।"
तब से यह संख्या रामानुजन संख्या के नाम से प्रसिद्ध हो गई। वास्तव में ही यह संख्या एक अत्यंत विशिष्ट संख्या है। इसकी विशिष्टता के कुछ पहलुओं को आगे स्पष्ट किया गया है:
1. दो घनों के योग के रूप में दो अलग-अलग ढंगों से व्यक्त की जा सकने वाली सबसे छोटी संख्या :
17291728+1=123+13
1729-1000+729=103+93
तथापि, यदि हम ऋणात्मक पूर्णाकों पर भी विचार करें तो यह शर्त पूरी करने वाली सबसे छोटी संख्या 91 होगी:
9164+2743+33
91216-125-216+(-125)=6+(-5)3 संयोगवश 91 संख्या 1729 का एक गुणखंड भी है।
2. हर्शद संख्या: यदि किसी प्राकृतिक संख्या के अंकों का योग उस संख्या का गुणनखंड हो तो उस संख्या को हर्शद संख्या कहा जाता है। 1729 एक हर्शद संख्या है।
1 + 7 + 2 + 9 = 19 जो 1729 का गुणनखण्ड है।
3. कार्मिकैल संख्या किसी भाज्य प्राकृतिक संख्या n को कार्मिकैल संख्या कहा जाता है, यदि
(a) 'n' पूर्ण वर्ग न हो
(b) कोई अभाज्य संख्या p संख्या n का गुणनखण्ड होने पर (p-1) भी (n-1) का गुणनखंड हो। पहली तीन कार्मिकैल संख्याएं क्रमशः नीचे दी गई हैं।
561 = 3 * 11 * 17 , यहाँ 3, 11 और 17 से एक-एक कम करके प्राप्त 2, 10 और 16 सभी संख्याएं, 561 से एक कम 560 के गुणनखण्ड हैं, 1105 = 5 * 13 * 17 यहाँ भी 5, 13 और 17 से एक-एक कम करके प्राप्त 4, 12 और 16 सभी संख्याएं, 1105 से एक कम 1004 के गुणनखंड हैं।
इस तरह 1729 = 7 * 13 * 19 में भी 7, 13 और 19 से एक-एक कम करके प्राप्त 6, 12 और 18 सभी संख्याएं, 1729 से एक कम 1728 के गुणनखंड है।
4. 1, 81, 1458 एवं 1729 भी संख्याओं की एक विशिष्ट श्रेणी है। यदि इन संख्याओं में किसी के अंकों को आपस में जोड़ा जाए और इस प्रकार प्राप्त संख्या को व्युत्क्रम क्रम में लिखकर उसके साथ गुणा किया जाए तो वही संख्या प्राप्त होती है। उदाहरण के लिए:
(1) 1 * 1 = 1
(81) 8 + 1 = 9; 9 * 9 = 81
(1458) 1 + 4 + 5 + 8 = 18 18 * 81 = 1458
(1729) 1 + 7 + 2 + 9 = 19 19 * 91 = 1729
राष्ट्रीय गणित वर्ष 2012
न केवल विज्ञान को पढ़ने-समझने के लिए गणित एक महत्वपूर्ण विषय है, बल्कि हमारे दैनिक जीवन में गणित की अहम भूमिका होती है। चाहे घर खर्च का हिसाब-किताब रखना हो या बाजार से कुछ भी खरीदना हो, अपने कपड़े सिलवानें हों, घर का नक्सा बनाना हो या फिर घर बनवाने के लिए सामान खरीदना हो गणित ही काम आता है।
वाहन चलाते समय दूरी की हिसाब रखना हो या फिर डीजल के खर्च का या प्रति किलोमीटर का खर्चा निकालना हो, गणित का ज्ञान ही तो हमारी मदद करता है। दरअसल, घर में रसोई से लेकर बाजार आदि सभी के लिए संख्याओं और उनको लेकर की जाने वाली विभिन्न गणनाओं की जानकारी हमारे लिए काफी महत्वपूर्ण है। आधुनिक विज्ञान और टैक्नोलोजी के विकास का आधार भी गणित ही है। चाहे कम्प्यूटर का क्षेत्र हो या रॉकेट प्रक्षेपण सभी की सफलता गणितीय गणनाओं पर निर्भर करती है। गणित के क्षेत्र में भारत का अतुल्य योगदान रहा है। भारत में भाष्कराचार्य, रामानुजन एवं हरिश्चंद जैसे महान गणितज्ञ पैदा हुए हैं. इनमें से श्रीनिवास रामानुजन आयंगार एक ऐसे ही महान गणितज्ञ थे, जो यद्यपि बहुत कम वर्षों तक इस दुनियां में रहे, लेकिन इतने कम समय में ही उन्होंने गणित के क्षेत्र में इतने गूढ़ एवं महत्वपूर्ण कार्य किए कि आज तक विश्वभर के गणितज्ञ उन कार्यों पर शोध कर रहे हैं। 22 दिसंबर 2012 को उस महान गणितज्ञ के जन्म को 125 वर्ष हो जाएँगे, गणित के क्षेत्र में उनके कार्य को याद करते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2012 को राष्ट्रीय गणित वर्ष के रूप में मनाने की घोषणा की है। कौन थे रामानुजन और क्या था उनका विशेष योगदान, इसको प्रचारित करने के उद्देश्य से इस अंक में संख्याओं के इस जादूगर के जीवन एवं कार्यों पर एक विशेष लेख के साथ-साथ गणित को मनोरंजक बनाने के लिए कुछ और लेख भी इस अंक में दिए गए हैं। आइए, राष्ट्रीय गणित वर्ष को मिलकर सफल बनाएं और गणित को रोचक एवं मनोरंजक तरीके से प्रस्तुत कर बच्चों में गणित के प्रति रूचि पैदा करें। महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन को यही हमारी सच्ची श्रद्धांजली होगी।
डॉ. ओउम प्रकाश शर्मा
जोसेफ लुई लाग्रांज 18वीं सदी का महान गणितज्ञ
Joseph-Louis Lagrange - Great Mathematician of 18th Century
प्रो. महेश दुबे Prof. Mahesh Dube
सारांश
लाग्रांज के जीवन और कार्य संबंधी यह जीवनीपरक निबंध समयावधि 1736-1813 के दौरान बीजगणित के विकास की कहानी का वर्णन करता है। 1789 की फ्रांसिसी क्रांति और उसके बाद के नवोन्मेष ने उस काल के गणितीय जगत में किस प्रकार परिवर्तन किए इस सबकी चर्चा की गई है। उस काल के कुछ वैज्ञानिक, राजनैतिक, सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक वातावरणों की एक दूसरे पर प्रभावों की चर्चा भी की गई है।
ABSTRACT
This biographical essay on the life and work of Lagrange narrates the story of development of algebra during the period 1736-1813. The article discusses how did the french revolution of 1789 and the renaissance thereafter changed the mathematical world. Some interaction of scientific, political, social and psychological atmosphere of the time is also discussed.
"पुराने दिन से जिस तरह नया दिन मिलता है, जिस तरह पुरानी ऋतु से नई ऋतु मिलती हैं, जैसे पुरानी घास में से नयी घास अंकुरित होती है"-उसी तरह बीतने वाली शताब्दी की गणितीय परम्पराओं से नयी शताब्दी का गणित उद्घाटित होता है। इसमें गणितीय विधाओं के पुनसृजन के साथ नवोन्मेष के अनुभवों की उत्तेजना अनिवार्य रूप से शामिल होती है। गणित के इतिहास में 18वीं शताब्दी का समय प्रतिभाओं की शताब्दी के बाद का और गणित के आने वाले स्वर्ण युग के पूर्व के सौ वर्षों का युग है। दरअसल अठारहवीं सदी वैश्विक फलक पर व्यापक परिवर्तनों की शताब्दी थी। 1766 में अमेरिकन क्रान्ति की शुरूआत हुई और 1789 में हुई फ्रांस की राज्यक्रान्ति ने एक नये युग का सूत्रपात किया जिसकी वैचारिक पृष्ठभूमि-वाल्तेयर, रूसो, दिलांबर और दिदरों ने तैयार की थी। यद्यपि इनमें से कोई भी इसे देखने के लिये जीवित नहीं रहा था। वाल्तेयर और रूसो की मृत्यु 1778 में, दिलांबर की 1783 में और दिदरों की मृत्यु 1784 में हुई। 18वीं शताब्दी का समय यांत्रिकी खगोलिकी, अवकल-समीकरणों और प्रायोज्य गणित की श्रेष्ठतम अभिव्यक्ति का समय रहा है। इसी शताब्दी में शुद्ध गणित की भाषा को सहजता और प्राजंलता के गणितीय संस्कार मिले।
जोसेफ लुई लाग्रांज (1736-1813) अठारहवीं शताब्दी के प्रतिनिधि गणितज्ञ कहे जाते हैं। लाग्राजियन, लाग्रांज समीकरणों, लाग्रांज गुणकों, लाग्रांज अन्तर्वेशन, लाग्रांज अवशेष, लाग्रांज प्रमेय जैसी अनेक संकल्पनाओं के सूजनकर्ता के रूप में उनका नाम उनके विराट गणितीय योगदान का स्मरण दिलाता है। उन्होंने साम्राज्यों के ऐश्वर्यों को देखा, क्रान्ति के परिवर्तनों को देखा और प्रतिक्रान्ति के दौर से गुजरते हुए, केवल अपनी गणितीय प्रतिभा के बल पर नेपोलियन के विश्वासपात्र भी बने। वे इटली में जन्में, बीस वर्षों से भी अधिक समय तक बर्लिन में रहे और जीवन के अंतिम 27 वर्ष फ्रेंच नागरिक के रूप में प्रतिष्ठा के साथ गुजारे। ऐसी ही वैश्विक प्रतिभाओं के लिये संस्कृत के कवि दण्डी ने कहा है:
स्वदेशो देशान्तरमिति नेयं गणना विदग्धपुरूषस्य' अर्थात् बुद्धिमान व्यक्ति के लिये स्वदेश और परदेश का भेद नहीं होता।
लग्रांज का जन्म इटली के तुरीन शहर में 25 जनवरी 1736 को हुआ था। उनके पिता का नाम गेसिप लाग्रांजिया और माँ का नाम टेरेसा ग्रोसो था। टेरेसा एक समृद्ध परिवार से थीं और अपने डाक्टर पिता की इकलौती संतान थीं। गेसिप वंश परम्परा से फ्रेंच थे पर इटली के सार्डनिया राज्य में बस गये थे और तुरीन में एक उच्चाधिकारी थे। गेसिप को पैतृक और अपनी पत्नी के परिवार से काफी संपत्ति प्राप्त हुई थी। किंतु अपने पुत्र जोसेफ के वयस्क होने तक वे अपनी सारी संपत्ति गँवा चुके थे। परन्तु लाग्रांज को कभी इसका दुःख नहीं हुआ। उनका कहना था कि धन के अभाव ने गणित में उनकी स्वाभाविक रुचि और नैसर्गिक प्रतिभा को विकसित होने के अवसर प्रदान किये।
उनकी शिक्षा और गणित में उनकी रुचि के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती। ऐसा माना जाता है कि-प्रकाशिकी में बीजगणित के उपयोग पर एडमंड हेली के एक निबन्ध को पढ़कर वे गणित के अध्ययन के लिये प्रेरित हुए। 19 वर्ष की आयु में विचरण कलन सम्बन्धी अपने कार्यों की जानकारी उन्होंने आयलर को भेजी। आयलर स्वयं वर्षों से इस विषय पर कार्य कर रहे थे। पर तरुण लाग्ग्रांज को इसका श्रेय देते हुए, आयलर ने उन्हें प्रोत्साहित किया। शीघ्र ही लाग्रांज के कार्यों को प्रतिष्ठा मिली और 1755 में वे तुरीन के रॉयल आर्टीलरी कालेज में गणित के प्राध्यापक नियुक्त किये गये।
यहाँ, किये गये अत्यधिक श्रम ने उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से थका दिया। 1762 में वे बीमार पड़ गये। यद्यपि उन्होंने शीघ्र ही स्वास्थ्य लाभ कर लिया, पर रोग ने उनका पीछा जीवन भर नहीं छोड़ा। वे कई बार निराश और अवसादग्रस्त हो जाते थे।
1764-में उन्हें फ्रेंच अकादमी का प्रतिष्ठित ग्राँ-पुरस्कार मिला। यह पुरस्कार उनके प्रबन्ध-Why does the Moon always present same face to the earth.
पर दिया गया था। खगोलकी में गणित के अनुप्रयोगों के लिये उन्होंने यह सम्मान 1766, 1772, और 1780 के वर्षों में प्राप्त कर एक कीर्तिमान स्थापित किया। इन्हीं वर्षों में दिलांबर से उनकी गहरी मित्रता हुई।
1766 में आयलर-बर्लिन अकादमी छोड़कर सेंट पीट्सबर्ग जा रहे थे। आयलर और दिलांबर दोनों की अनुशंसा पर प्रशिया के सम्राट फ्रेंडरिक ने लाग्रांज को आमंत्रित करते हुए लिखा 'यूरोप के महानतम सम्राट की इच्छा है कि यूरोप का महानतम गणितज्ञ उसके निकट हो।'
दरअसल फ्रेडरिक अपने शाही गणितज्ञ आयलर के रूखे व्यवहार और दार्शनिक मान्यताओं से ऊब चुके थे। महान आयलर के दीर्घ जीवन के संध्याकाल की यह शुरूआत थी। वे अपनी एक आँख खो चुके थे। आडंबरहीन आयलर कुछ चिड़चिड़े भी हो गये थे। फ्रेडरिक उन्हें 'गणि तिज्ञों के कबाड़ का एकाक्षी' कहा करते थे। सौभाग्य से इसी समय रूस की साम्राज्ञी कैथरीन-द्वितीय ने आयलर को सेंट पीट्सबर्ग अकादमी में वापस आने का आमंत्रण भेजा। लाग्रांज की नियुक्ति पर, आयलर से चिढ़े, फ्रेडरिक ने दिलांबर को लिखा-
to To your trouble and your recommendation I owe the replacement in my Academy of a mathematician blink in one eye by a mathematician with two eyes, which will be especially pleasing to the anatomical section.
लाग्रांज ने तुरीन को अलविदा कहा और अक्तुबर 1766 के अंत में वे बर्लिन पहुँचे। यहीं 1769 में उन्होंने विवाह किया। 1783 में लम्बी बीमारी के उपरान्त उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई। इसके उपरान्त उन्होंने अपना सारा समय गणितीय शोध कार्यों के लिये ही समर्पित कर दिया।
बर्लिन में उनके बीस वर्ष उपलब्धियों से भरे हुए थे। इस समय वे अपनी गणितीय सक्रियता के चरमोत्कर्ष पर थे। इन वर्षों में उन्होंने संख्या-सिद्धान्त और समीकरणों पर उल्लेखनीय कार्य किया। उन्होंने समीकरण-
x⁵ –1 = 0 ......... (1)
को हल किया। x = 1 इसका एक मूल है। शेष समीकरण-
x⁴ + x³ + x² + x + 1 = 0 ........... (2)
के मूल हैं, जिसे लाग्रांज ने निम्न रूप में व्यक्त किया-
(x² + 1/x²) + (x + 1/x) + 1 = 0 ........... (3)
अब x + 1/x = y रखने पर, समीकरण
y² + y – 1 = 0 ............. (4)
प्राप्त होती है, जिसे y के लिये हल किया जा सकता है, और फिर x का मान प्राप्त किया जा सकता है।
लग्रांज ने समीकरण---(5) x¹¹ – 1 = 0
को भी इसी प्रकार हल करने का प्रयास किया। इसे x - 1 से भाग देने पर लाग्रांज ने प्राप्त किया-(x² + 1/x²)) + (x + 1/x) – 1 = 0 अब-रखने पर एक पाँच घातीय समीकरण प्राप्त होती (x⁵ + 1/x⁵) + (x⁴ + 1/x⁴) + (x³ + 1/x³) + x + 1/x = y है।
लाग्रांज ने इस समस्या को यहीं छोड़ दिया था। रेडिकल्स के द्वारा इसे वेन्दरमान्दे ने हल किया।
गाउस ने-xⁿ – 1 = 0 की साधनीयता के प्रमेय की उपपत्ति दी और विशिष्ट स्थिति में-x¹⁷ – 1 = 0 को हल किया। इन्हीं वर्षों में लाग्रांज ने विल्सन के प्रमेय-किसी अभाज्य संख्या ρ (rho) के लिये (ρ – 1) 1 + 1
को ρ से भाग दिया जा सकता है की उपपत्ति दी और पेल के समीकरणों पर कार्य करते हुए N x² + 1 = y² के सभी पूर्णांक हल प्राप्त किये।
डायफोन्ट्स की अरिथमेटिका से प्रभावित होकर Bachet de Meziriac ने 1621 में यह अनुमान व्यक्त किया था किः प्रत्येक धनात्मक पूर्णांक चार वर्गों का योग है। लाग्रांज ने इस अनुमान को 1770 में सिद्ध किया।
अपने द्वि-घातीय प्रारूपों पर किये गये कार्य के माध्यम से लाग्रांज ने बीजगणितीय संख्याशास्त्र (Algebraic Number Theory) की आधारशिला रखी।
एक विषम अभाज्य के लिये फर्मा ने नीचे दिए गए तीन प्रमेय लिखे थे-
ρ = x² + y² <=> p ≡ 1 (mod4) -1640
( x = 2 , y = 3 then p = 13 ≡ 1(mod 4))
p = x² + 2y² p ≡ or 3(mod 8) -1654
( x = 3, y = 2 then p = 17 ≡ 1(mod 8))
( x = 5, y = 3 then p = 43 ≡ 3(mod 8))
p = x² + 3y² p ≡ 1(mod 3) -1654
( x = 2, y = 3 then p = 31 ≡ 1(mod 3))
लाग्रांज ने न केवल इन प्रमेयों को सिद्ध किया अपितु x² + 5y² प्रकार के विषम अभाज्यों के लिये भी स्थितियों को स्पष्ट किया। इन्हीं वर्षों में उन्होंने वह परिणाम भी प्राप्त किया जो ग्रुप-थ्योरी में लाग्रांज प्रमेय के नाम से जाना जाता है। उन्होंने समीकरणों के मूलों के संख्यात्मक सन्निकट मान को वितत् भिन्नों के माध्यम से व्यक्त करने की प्रविधि पर भी कार्य किया।
1786-में फ्रेडरिक के निधन के बाद, वे फ्रांस के सम्राट लुई-16वें के निमन्त्रण पर पेरिस की विज्ञान अकादमी में आ गये। लगभग इसी समय दो घटनायें हुई। एक तो उनका मन गणित से विरक्त हो गया। दूसरे-1788 में (Mechanique Analytique) का प्रकाशन हुआ। परन्तु गणित से विरक्त उनके मन और थके हुए मस्तिष्क ने उन्हें अपनी ही इस कृति को खोलकर देखने तक की इजाजत नहीं दी। लगभग दो वर्षों तक यह पुस्तक लेखक के हाथों के स्पर्श की प्रतीक्षा में टेबल पर पड़ी रही। इसमें एक गतिशील निकाय के लिये गति के समीकरण हैं, जिन्हें लाग्रांज समीकरण के नाम से जाना जाता है। अत्यन्त तर्कसम्मत और सहज इस ग्रन्थ में एक भी ज्यामितीय आकृति नहीं है-और लेखक को इस उपलब्धि पर गर्व था। होमर और वर्जिल लाग्रांज के प्रिय कवि थे। सम्भवतया उन्हीं के प्रभाव के कारण लाग्रांज के इस ग्रन्थ में काव्यात्मकता पाई जाती है। सुप्रसिद्ध गणितज्ञ सर विलियम रोबेन हेमिल्टन के शब्दों में यह "गणित के शेक्सपियर का वैज्ञानिक काव्य है।"
दो वर्षों का यह समय लाग्रांज ने तत्त्वमीमांसा, धर्म, दर्शनशास्त्र, इतिहास, चिकित्सा शास्त्र, वनस्पतिशास्त्र और रसायनशास्त्र के अध्ययन में बिताया। रसायन शास्त्र के लिये वे कहते थे, "यह तो बीजगणित जैसा ही सरल विषय है।"
पेरिस में रहते हुए उन्होंने राज्यक्रान्ति को देखा। क्रान्ति के दौरान उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार किया गया। सारे विदेशियों को देश से बाहर जाने के आदेश में उनके नाम के उल्लेख के साथ उन्हें इससे छूट दी गयी थी। उन्हें नाप-तौल की प्रणाली तय करने की समिति का अध्यक्ष बनाया गया और उनके ही प्रयासों से मीट्रिक प्रणाली अपनायी गयी। क्रान्ति की उथल-पुथल ने उनके मन और मस्तिष्क को झकझोरा-और वे हर गणित की ओर प्रवृत्त हुए। अचानक ही उनके एकाकी जीवन में वसन्त आया। 19-वर्ष की एक तरूणी 56 वर्ष के इस वृद्ध गणितज्ञ पर रीझ गयी। यह युवती लाग्रांज के खगोलविद् गणितज्ञ मित्र ल मॉनिए (Le monnier) की पुत्री रेने-फ्रान्कवा एडेलेड ल मॉनिए थी। 1792 में दोनों विवाह सूत्र में बँध गये। लाग्रांज की नयी जीवन संगिनी एक समर्पित और योग्य पत्नी साबित हुई। उनका शेष जीवन सुख से बीता।
1795-में इकोले नार्मल की स्थापना हुई। नये प्रशासन ने लाग्रांज को वहाँ गणित का प्राध्यापक नियुक्त किया और लाग्रांज पुनः "नार्मल" होकर गणित में रूचि लेने लगे। इसी संस्था में उनके व्याख्यानों से दो पुस्तकें तैयार हुई-
Theory of Analytic Functions (1797)
Lessons on Calculus of Functions (1801) इन्हीं पुस्तकों में लाग्रांज ने-f' (x), f" (x),... ... के संकेत का उपयोग किया है और यहीं टेलर की श्रेणी में आये लाग्रांज अवशेष को परिभाषित किया गया है।
वे एक शांत और संतुलित मिजाज के व्यक्ति थे, जो अपनी शालीनता और गणितीय निष्ठा के लिये जाने जाते थे। स्वभाव से ही वे विवादों से दूर रहते थे। दिलांबर को अपने एक पत्र में उन्होंने लिखा था : 'प्रत्येक स्थिति में शाति, युद्ध से बेहतर है।' वे निस्पृह और विरक्त प्रकृति के व्यक्ति थे। संगीत में उनकी रूचि थी। वे कहा करते थे कि संगीत मुझे गणित के लिये एकाग्रता देता है।
1778-में अपनी मृत्यु के पूर्व वाल्तेयर ने कहा था-'भाग्यशाली हैं युवक! वे महान घटनाओं के साक्षी होंगे।' और युवकों ने न केवल एक महान परिवर्तन को देखा, अपितु उसमें अपनी सहभागिता भी अंकित की। 1789 में बेसिल के पतन के साथ ही फ्रांस की राज्यक्रान्ति की शुरुआत हुई। जहाँ अमेरिकी क्रान्ति ने राष्ट्र का प्रथम प्रारूप प्रस्तुत किया, वहीं फ्रांसीसी राज्यक्रान्ति ने राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद की नयी संकल्पनाओं को जन्म दिया। इस क्रान्ति ने एक ज्वालामुखी की तरह फूट कर सारे यूरोप को अपनी चकाचौंध से चमत्कृत कर दिया था। परन्तु ज्वालामुखी एकदम से ही नहीं फूट पड़ते और क्रान्तियाँ भी एकाएक एक रात में नहीं हो जाती। फ्रांस की राज्यक्रान्ति की पृष्ठभूमि भी अत्यन्त विस्तृत और व्यापक है। क्रान्ति के कुछ समय बाद ही उग्रवादी हस्तक्षेप बढ़ता गया। आतंक के साम्राज्य ने समता, स्वतंत्रता और बन्धुत्व के महान उद्देश्यों को आच्छादित कर लिया। यह गणतन्त्र के पतन की ओर प्रतिक्रान्ति की शुरुआत थी। 1804 में नेपोलियन ने अपने को फ्रांस का सम्राट घोषित कर दिया। सत्ता परिवर्तन के दौर में भी शैक्षिक और वैज्ञानिक गतिविधियां जारी रहीं।
कोन्देसे (Condorcent: 1743-94), मोंगे (Monge: 1746-1818), लाप्लास (Laplace: 1749-1827). लिजान्द्र (Legandre 1752-1831), कार्नोत (Carnot: 1753-1823) और लाग्रांज जैसे प्रसिद्ध गणितज्ञ परिवर्तन के इस युग में भी सक्रिय थे।
क्रान्ति के समर्थक कोन्दोंसे का दुःखद अन्त हुआ। वे उग्रवादियों के विरोध के कारण पकड़े गये, जेल भेजे गये, जहाँ उन्होंने आत्महत्या कर ली। मृत्यु के पूर्व उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति 'स्केच फॉर ए हिस्टॉरिकल पिक्चर आफॅ द प्रोगेस ऑफ द ह्यूमन माइंड' पूरी की। वे एक सुयोग्य गणितज्ञ और साख्यिकीविद् थे। स्वभाव से वे अन्याय के विरोधी थे और शिक्षा को सामाजिक उत्थान की प्रथम सीढ़ी मानते थे। "मैं सम्राटों का अनम्य शत्रु हैं" कार्नोत कहा करते थे। 1793 में यूरोप की जनतन्त्र विरोधी प्रतिक्रियावादी ताकतों की एक विशाल सेना को पराजित करने में उन्होंने संगठनकर्ता की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। कानोंत की भाँति मोंगे भी अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धताओं के लिये विख्यात थे। वे क्रान्ति के बाद प्रतिक्रान्ति से गुजरते हुए नेपोलियन के निकट पहुँचे थे-पर अंत में निर्वासित जीवन ही उनकी नियति में था। वे डिसक्रिप्टिव ज्यामिति (Descriptive Geometry) के प्रणेता थे। नेपोलियन के पतन के उपरान्त ही उनके भी बुरे दिन शुरू हो गये। उनके सारे सम्मान छीन लिये गये। उनकी मृत्यु पर पॉलीटेकनिक के विद्यार्थियों को उनकी शवयात्रा में शामिल होने की अनुमति नये सम्राट द्वारा नहीं दी गयी। पर वे सब दूसरे दिन पंक्तिबद्ध होकर उनकी समाधि पर श्रद्धांजलि देने एकत्र हुए, क्योंकि राजाज्ञा में केवल शवयात्र के निषेध का ही उल्लेख था। नेपोलियन ने जब अपने को सम्राट घोषित किया था तब इन्हीं विद्यार्थियों ने उसका जमकर विरोध किया था। तब नेपोलियन ने कहा थाः 'मोंगे! तुम्हारें लड़कों ने मेरे खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।' मोंगे ने उत्तर दिया-'महोदय! उन्हें जनतन्त्रीय (रिपब्लिकन) बनाने में हमें काफी मेहनत करनी पड़ी थी। अब उन्हें साम्राज्यवादी (रॉयलिस्ट) बनने में कुछ वक्त तो लगेगा ही। और मुझे यह भी कहने की अनुमति दें कि आप भी सिंहासन पर अचानक ही आ गये हैं।' लाप्लास अपनी अवसरसंबद्धता के कारण प्रशासन के हर युग में महत्वपूर्ण बने रहे। खगोल-यांत्रिकी पर उनका युगान्तरकारी कार्य पाँच खण्डों में प्रकाशित हुआ था। उनके अंतिम शब्द थेः 'जो हम जानते हैं वह अत्यन्त अल्प है पर जो हम नहीं जानते वह विराट है।' लिजान्द्र राजनैतिक रूप से उदासीन थे। परन्तु विज्ञान अकादमियों में राज्य के बढ़ते हुए हस्तक्षेप के विरोध के कारण उनकी पेंशन बन्द कर दी गयी थी। उनके जीवन के अंतिम दिन आर्थिक तंगी के थे।
इन सब में लाग्रांज ने ही निर्बाध रूप से अपनी गणितीय प्रतिभा के बल पर सम्मान अर्जित किया। जहाँ वे फ्रेडरिक महान, लुई 16वें और मेरी अंतानिओ के कृपा-पात्र थे तो वहीं क्रान्ति के सूत्रधारों ने उनकी गणितीय प्रतिभा का भरपूर उपयोग किया और बाद में नेपोलियन ने भी उनको उचित सम्मान दिया। नेपोलियन ने उन्हें सीनेटर बनाया, साम्राज्य के काउण्ट की पदवी दी और सेना के अधिकारी की सम्मानजनक नियुक्ति दी। नेपोलियन उन्हें गणित विज्ञान का उत्तुंग सूची स्तम्भ(Lofty pyramid of the Mathematical Sciences) कहा करता था।
वे जन-साधारण तक गणितीय ज्ञान को पहुँचाने के पक्षधर थे। वे कहा करते थे कि यदि एक गणितज्ञ आम आदमी को अपनी बात नहीं समझा सकता तो इसका अर्थ है कि उसने अपने ही विषय को ठीक से नहीं समझा है। उनका यह भी मानना था कि बीजगणित और ज्यामिति की जुगलबन्दी से दोनों ही विधाओं को नयी ऊर्जा मिलती है और ये संयुक्तरूप से गणित की श्रेष्ठतम उपलब्धियों को जन्म देंगी। जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने अपने ग्रन्थ-Mechanique Analytique को संशोधित और परिष्कृत किया, जो दो खण्डों में प्रकाशित हुआ। 1813 में वे बीमार पड़े। 08 अप्रैल 1813 को उनके कुछ मित्र उनके लिये-The Grand cross of the order of Reunion का राजकीय सम्मान लेकर आये, तब उन्होंने कहा था-
"मृत्यु का भय नहीं होना चाहिए। कष्टरहित मृत्यु एक अंतिम उत्सव है जो निश्चित ही दुःखपूर्ण नहीं है। मैंने जीवन में बहुत कुछ पाया मैनें कभी किसी से घृणा नहीं की और न ही किसी को दुःख दिया। यह मेरा अंतिम समय है।"
इसके ठीक दो दिन बाद 10 अप्रैल-1813 को उनकी मृत्यु हुई। वे अपने विशाल और मौलिक योगदान के साथ-साथ अपने कार्यों में लालित्य और उत्कृष्टता के लिये हमेशा याद किये जायेंगे।
वैदिक संगणना प्रविधि-प्रतिमान Vedic Computational Paradigm
प्रो. ओम विकास
Prof. Om Vikas C-15 Tarang Apartment, 19, L.P. Extn, Delhi - 110 092 e-mail id: dr.omvikas@gmail.com
सारांश
19वीं और 20वीं सदी में आधुनिक गणित का विकास तेजी से हुआ। 2500 वर्ष पहले खगोल विज्ञान, स्थापत्य, भवन निर्माण आदि क्षेत्रों में वैदिक गणित का प्रयोग किया जा रहा था। शून्य, दशमलव प्रणाली, बीज गणित की परिकल्पना उसी काल में की गई। जटिल गणनाओं के लिए सुगम प्रविधियों को विकसित किया गया। वैदिक गणित का सुगम प्राविधिक स्वरूप शुल्ब सूत्रों से वर्णित है। लेख में प्राचीन और आधुनिक गणना प्रणालियों के सह-ज्ञान से तार्किक विश्लेषण के साथ सुगम वैदिक गणित को आधुनिक गणितीय परिप्रेक्ष्य में रखने का प्रयास किया गया है। एक नवीन प्रविधि भी प्रस्तावित है जो पैटर्न के आधार पर है। इससे कम्प्यूटर संगणना गति बढ़ाने में मदद मिल सकती हैं। ये प्रविधियाँ बच्चों में अनुप्रेरित तार्किक विश्लेषण और कौशल विकास में भी सहायक होगीं।
विषय बोधक शब्दः पैटर्न आधारित कलन विधि (एल्गोरिद्म), वैदिक गणित, गणितीय सृजनात्मकता, अनुप्रेरित तार्किक विश्लेषण।
ABSTRACT
Modern Mathematics advanced during 19th & 20th century. Vedic Maths was developed and used about 2500 years ago in Astronomy, Architecture and Building Constructions. Zero, Decimal Systems and Algebra were in Vogue. Simple Algorithms were developed to solve complex problems. Simple techniques of Vedic Mathematics are based on sulb sutras. Confluence of Vedic Maths and Modern Mathematics knowledge may help in promoting Mathematical reasoning and innovation. This paper presents basis of Vedic Mathematics in the perspective of modern Mathematics. A new multiplication algorithm is also presented. Pattern based computing may enhance computing speed. These simple techniques will help in developing inductive reasoning and mathematical skill in children.
Keywords: Pattern based Algorithm, Vedic Maths, Mathematical Creativity, Inductive Reasoning
1. विषय-प्रवेश
दुनिया भर में प्रयास किए जा रहे है कि बच्चों में गणितीय कौशल का विकास हो, नवाचार प्रवृत्ति का विकास हो। गणित में अभिरूचि बढ़े। यदि एक से अधिक समस्या समाधान प्रणालियों की जानकारी है तो नवाचार की संभावनाएं बढ जाती हैं तार्किक विश्लेषण अनुप्रेरक (इंडक्टिव) हो सकता है अथवा आगमनात्मक (डिडक्टिव)। इंडक्टिव विश्लेषण में अवलोकन से प्राप्त डेटा के आधार पर निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। जबकि डिडक्टिव विश्लेषण में थ्योरी, प्रमेय, स्वयंसिद्ध नियमों के आधार पर निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। अवलोकन प्रकिया में पैटर्न देखते हैं, अनुमान करते हैं यहाँ अन्तः बोध महत्त्वपूर्ण है। गणितीय सृजनात्मक कौशल के लिए इंडक्टिव रीजनिंग (अनुप्रेरित तार्किक विश्लेषण) महत्वपूर्ण उपादान हैं। 2500 वर्ष पूर्व वैदिक गणित का विकास हुआ, प्रचलन में रहा। अनेक आधारभूत योगदान उल्लेखनीय है जैसे शून्य एवं संख्या का स्थान परक मान, ज्यामिति, खगोल विज्ञान, बीज गणित, वर्गमूल कलन विधियाँ आदि। मंदिर, किला, सेतु, भवन निर्माण में गणित का प्रयोग सामान्य रूप से होता था। सुबोध गणित जन सामान्य में भी प्रचलित था। इससे उस काल में अनुप्रेरक तार्किक विश्लेषण की सहज प्रवृत्ति भारतीय समाज में विकसित हुई, जो नवाचार के लिए महत्त्वपूर्ण है।
2. संख्या प्रणाली
अवलोकन जन्म गणित प्रायः प्राकृतिक संख्याओं तक ही सीमित है। सामान्य गणित में अनुक्रमिक गणना को इसमें सम्मिलित किया जाता है। वैदिक गणित में अंक स्तर पर अलग-अलग एक समय में समान्तर (पैरालल) गणना कर सकते हैं। इससे गणना-गति बढ़ जाएगी। गणना किसी भी आधार संख्या पर संभव हैं। यहाँ पर विषय प्रतिपादन की सुगमता की दृष्टि से वैदिक गणनाएं दशमलव प्रणाली पर प्रस्तुत हैं।
3. बीजगणितीय सुसंगतता
महाभारत में नकुल को सबसे सुंदर बताया गया है। नकुल अंक वे है, जो दशमलव प्रणाली में औसत से अधिक हों। नकुल (ऊपरी) अंको को नीचे के अंकों में बदलने को वि-नकुलन कहते हैं। इस विधि से अंक स्तरीय गणना संभव है और समान्तर गणना भी।
अंक-समूह का वि-नकुलन करने से 10 का पूरक (10's Complement) मिलता हैं।
इस संख्या सेट पर रैखिक बीज गणित के अपेक्षित स्वयं सिद्ध नियम, जैसे: विनिमेयता (Commutability), साहचर्य (Associatively), वितरण (Distributivity), एकल पहचान Identity, और व्युतिक्रम Inverse लागू होते हैं।
Commutativity:
a + b = b + a,
a x b = b x a
Associativity:
a + ( b + c ) = ( a + b ) + c,
a x b x c = a x ( b x c )
= ( a x b) xc
Distributivity:
a x ( b + c ) = ( a x b ) + ( a x c )
Identity:
a + 0 = a,
a x 1 = a (Integer, a ∈ I)
a + 0.0 = a x 1.0 a (Real,ae R)
a + (0 + j0) = a, a x (1 + j0) = a
(Complex, ae c)
Inverse:
a + a' = 0, a x 1/a = 1
aelorae Rorae C
(Integer/Real/Complex)
4. शुल्ब सूत्र
वैदिक गणित के 16 आधारभूत सूत्र/फॉर्मूले है और 13 उपसूत्र।
शुल्ब सूत्र
1. एकाधिकेन पूर्वेण (अर्थात् पिछले वाले से एक अधिक)
By one more than the previous one.
2. निखिलं नवतश्चरम दशतः (अर्थात् सभी को 9 से और अंतिम अंक को 10 से घटावें)
All from 9 and the last from 10.
3. ऊर्ध्व तिर्यग्भ्याम् (अर्थात् ऊर्ध्व अंकों और तिर्यक् (Cross wise) अंकों को गुणा करें)
Vertically and Crosswise
4. परावर्त्य योजयेत् (अर्थात् खड़ी पंक्ति को पड़ी पंक्ति में बदल कर योजित करना)
Transpose and adjust
5. शून्यं साम्य समुच्चये (अर्थात् जब योगफल समान हो तो योग शून्य होगा)
When the sum is the same then the sum is zero.
6. आनुरूप्ये शून्यमन्यत् (अर्थात् यदि एक अनुपात में है तो दूसरा शून्य होगा)
If one is in ratio the other is zero.
7. संकलन व्यवकलनाभ्याम् (अर्थात् जोड़ कर और घटा कर)
By addition and by subtraction.
8. पूर्णापूर्णभ्याम् (अर्थात् पूर्णता या अपूर्णता से By the completion or non-completion.
9. चलन कलनभ्याम् (अर्थात् विषमताएं और समानताएं)
Differences and similarities-
10. यावदनम् (अर्थात् कमी की कोई भी सीमा) Whatever the extent of its deficiency.
11. व्यष्टि व समष्टि (अर्थात् अंश अथवा सम्पूर्ण)
Individual or the whole
12. शेषन्यंकेन चरमेण (अर्थात् शेषमान अंतिम अंक से)
The remainders by the last digit.
13. सोपानत्य द्वयम् अन्त्यम् (अर्थात् अन्तिम और अन्तिम से पहले (उपान्त्य) का दुगना)
The ultimate and twice the penultimate.
14. एक न्यूनेन पूर्वेण (अर्थात् पिछले अंक से एक कम)
By one less than the previous one.
15. गुणित समुच्चयः (अर्थात् योगफलों का गुणनफल समान है गुणनफलों के योग के)
The product of the sum is equal to the sum of the product.
16. गुणक समुच्चयः (अर्थात् योगफल के पद खंड़ों के बराबर हैं पदखंड़ों का योगफल)
The factors of the sum is equal to the sum of the factors.
5. उपसूत्र (Corollary)
1. आनुरूप्येण
2. शिष्यते शेष संज्ञः
3. आद्यमाद्ये नान्त्यमन्त्येन
4. केवलैः सप्तकं गुण्यात्
5. वेष्टनम्
6. यावदूनं तावदूनं
7. यावदूनं तावदूनीकृत्य वर्ग च योजयेत्
8. अन्त्ययोर्दशके ऽप
9. अन्त्ययोरेव
10. समुच्चयः गुणितः
11. लोपस्थामानाभ्याम्
12. विलोकनम्
13. गुणितः समुच्चयः समुच्चय गुणितः
सूत्र, उपसूत्र वस्तुतः Micro-operations हैं, जो एक पैटर्न के मिलने पर काम में लिए जाने पर कम से कम समय में हल दे सकते हैं।
पैटर्न मिलान न होने पर सामान्य गणितीय प्रक्रिया करते हैं। वैदिक कम्प्यूटिंग का तात्पर्य कम्प्यूटर से इन विधियों से संगणना करना। हां, इससे कम्प्यूटर से संगणना प्रविधि में पैटर्न-आधारी संगणना का नया खोज मार्ग प्रशस्त होता हैं। बच्चों में पैटर्न पहचानने की क्षमता बढ़ती है; सृजनात्मकता का विकास होता हैं।
आइए, कुछ उदाहरण लेकर इस विषय को समझें।
1. विनकुलम् (इसमें सूत्र-2 "निखिलं नवतः चरमं दशतः" का प्रयोग करते हैं।)
इस संक्रिया का उपयोग 5 व उससे अधिक बड़े अंकों को 5 से छोटे अंकों में बदलकर आगे की संक्रियाएं करने के लिए होता है। इस प्रकार प्राप्त विनकुल (5 से छोटे) अंकों के ऊपर बार लगाकर व्यक्त किया जाता है। संख्या के जिस अंक समूह के ऊपर विनकुल बार होता है, उसे ऋण भाग मानकर शेष संख्या से घटाने पर मूल रूप में संख्या प्राप्त होती है।
n₁=631'4' = 6300 –14 = 6286 इस प्रकार
2. ऊर्ध्व गुणन (Vertical Product)
3. तिर्यक् गुणन (Cross Product)
तिर्यक् गुणन का योग (Sum of Cross Products)
तिर्यक् +
व्यव तिर्यक्गुणन (Difference of Cross Products)
तिर्यक –
4. त्रिभुजांक (समकोण त्रिभुज के संदर्भ में)
+ कोण A भुजाएं
A P²–1 2P P2+1
3 4 5
त्रिभुजांक का बीजक P हैं। पाइथागोरस थ्योरेम (प्रमेय) की भांति हैं। यह कात्यायन के शुल्ब सूत्र से व्युत्पन्न है।
5. एकाधिकेन पूर्वेण अर्थात् पिछले अंक से एक अधिक विनकुलम् में उच्च (5, 6, 7, 8, 9) अंकों को 10 का पूरक कर के लिख लेते है, अधो अंक (0,1,2,3,4) आने पर रूक जाते है और उसमें एक जोड़ देते है.
उदाहरण N = 23578
V. N = 24422
6. एक न्यूनेन पूर्वेण N का विनकुलम् (अर्थात् पिछली से एक कम): दो संख्याओं को गुणा करते समय पहले एक खडी पंक्ति (कॉलम) पर गुणा करते हैं, फिर दो कॉलम पर, फिर तीन कॉलम पर, सभी कॉलम को साथ ले लेने के बाद FIFO "प्रथम आए प्रथम गए" के आधार पर अंतिम कॉलम आने तक एक-एक कॉलम कम करते जाते हैं।
एकाधिकेन पूर्वेण
एकन्यूनेन पूर्वेण
3 अंकीय संख्याओं का गुणनफल 5 अंकीय संख्या होगी। यह गुणा बांए से अथवा दांए से दोनों ओर से कर सकते हैं।
7. बीजांक समजाँच
बीजांक
8. जोड़
पूर्णांक संख्या (Integer)
वास्तविक संख्या (Real Number)
समिश्र संख्या (Complex Numbers) विनकुलम् प्रयोग द्वारा
9. गुणा दो संख्याओं को गुणा करने के लिए निम्नलिखित उपक्रियाएं करते हैं:
★ संख्याओं को विनकुलित करके लिखे।
★ अंको को एक अंक का स्थान छोड़ते हुए फैलावें।
★ प्रक्रिया का प्रारम्भ बाएं से अथवा दाएं से करें।
★ अंक के नीचे ऊर्ध्व गुणनफल लिखें।
★ प्रथम तिर्यक् । अंक दूर (अर्थात् समीप) लें और छोडे हुए अंक स्थान के नीचे लिखें।
★ द्वितीय तिर्यक् 2 अंक दूर लें और मध्य अंक के नीचे लिखें।
★ तृतीय तिर्यक् 3 अंक दूर लें और मध्य अंक के नीचे लिखें।
★ इसी प्रकार करें, और अंतिम अंक तक पहुँचने पर रूकें।
★ कॉलम अंकों को जोड़ें।
★ विनकुलित योगफल का सामान्यीकरण करें।
गुणनफल स्थानपरक अंको से बनी संख्या है। हासिल (Carry) को बांए अंक में जोड़ते है इसी को इस चित्र से दर्शाया गया है।
सामान्यतः दो संख्याओं को गुणा करने में n² गुणन और n(n–2) जोड़ प्रक्रियाएं करनी पड़ती हैं।
ऊर्ध्व तिर्यक प्रयोग से n ऊर्ध्व गुणन, [n(n–1)]/2 तिर्यक जोड़ प्रक्रियाएं आवश्यक हैं।
तिर्यक् + (तिर्यक जोड़) प्रक्रिया में गुणन 2 × [n(n–1)]/2
और (n – 2)(n – 1) जोड प्रक्रियाएं हैं। इस प्रकार n + n(n – 1) अर्थात् n² गुणन और (n – 2)(n – 1) जोड़ प्रक्रियाएं आवश्यक हैं।
जोड़-गुणन प्रक्रियाएं समान है, लेकिन इस विधि से गुणन अंक के स्तर पर एक समय में (Parallel) गुणन सम्भव हैं। इस प्रकार गति बढेगी।
ऊर्ध्व-तिर्यक् गुणन पद्धति का सत्यापन
टिप्पणी : योग करते समय यदि किसी भी ऊर्ध्व स्तंभके योग में दो अंकों की संख्या प्राप्त हो तो दहाई का अंक हासिल के रूप में बाँई ओर के स्तंभ के योग में जुड़ जाता है।
वास्तविक एवं समिश्र (Real & Complex) संख्याओं की गुणा
समिश्र (1+j8) × (1 - j 2) =(18+j4)
उदाहरण-3
14.20/2.3 ⇒ Q = 6.1 और R = 0.17
केस 1
यदि भाजक संख्या 10 की गुणन संख्या के करीब है अर्थात् 9, 19 (10 गुणा 1) हैं, तो D भाज्य संख्या है, Q भाजनफल है।
यदि बेस = b है, गुणांक m = b/10 अर्थात् भाजक संख्या 10 की गुणा के करीब है। D भाज्य संख्या है। Q भाजनफल है। R शेष संख्या है।
पहचान कर हल बता देता है, तो इसे अनुक्रमिक सोच (Inductive Reasoning) कहते हैं। व्युत्पन्न सोच (Deductive Reasoning) में मूल संकल्पनाओं को आधार लेकर संक्रियाएं करके हल करते हैं। गणितीय अनुसंधान प्रायः अनुक्रमिक सोच का परिणाम है (M L Keedy 1965)। इस प्रकार गणितीय सृजनात्मकता का अनुक्रमिक सोच प्रबल आधार है। इससे सूत्र संभव हल की ओर इंगित करते हैं। इसके अतिरिक्त वैदिक गणित सूत्र से गणना बांयी ओर से कर सकते हैं. अथवा दांयी ओर से। उदाहरण के लिए ऊर्ध्व तिर्यक सूत्र में गणना बांयी अथवा दांयी ओर से कर सकते हैं। संगण ाना प्रक्रिया अंक स्तर पर है। बीजांक से संख्याओं पर की गई गणना की संभावित सही होने की जाँच कर सकते हैं। वैदिक गणित में संस्कृत में सूत्र, उपसूत्र दिए गए हैं, एल्गोरिद्म नहीं दिए गए हैं। इस प्रकार पैटर्न आधारी समस्या हल की विधि का प्रादुर्भाव होता है। यह सभी प्रकार की गणनाओं के लिए सरल सुबोध नहीं है, लेकिन पैटर्न पहचानने के बाद समस्या का हल बहुत आसान होता है। इस तरीके के अभ्यास से विद्यार्थियों में अनुक्रमिक सोच (Inductive Reasoning) का संवर्धन होगा, सृजनात्मकता बढ़ेगी।
भ्रांतियां
वाद-1 वैदिक गणित सूत्र गणित की प्रत्येक शाखा पर लागू होते हैं।
प्रतिवाद-1 वैदिक गणित सूत्रों को पैटर्न मिलने पर लागू करने से संगणना का विकल्प मिलता है। संगण ानात्मक जटिलता का मापन करने की आवश्यकता है।
वाद-2 वैदिक गणित से हल की शुद्धता, सही होने को सुनिश्चित करते हैं।
प्रतिवाद-2 हल के बीजांक को संख्याओं के बीजांक के सापेक्ष चैक करते हैं। लेकिन यह बीजांक चैक सदैव एक ही समान हो ऐसा नहीं है।
वाद-3 वैदिक गणित से विद्यार्थियों में तार्किक सोच और सृजनात्मकता में वृद्धि होगी।
प्रतिवाद-3 वैदिक गणित संगणना विधियों का विकल्प देता है। लेकिन इससे तार्किक सोच और सृजनात्मकता में कितनी वृद्धि होती है, यह शोध का विषय है। वैदिक गणित को स्कूल स्तर पर संख्या-खेल की तरह प्रचलित किया जा सकता है।
वाद-4 वैदिक गणित से अनुप्रेरित नयी वैदिक कंप्यूटर संरचना का विकास संभव है।
प्रतिवाद-4 माइक्रो प्रोग्रमिंग की तरह "पैटर्न आधारी माइक्रोओपरेशन" की व्यवस्था कंप्यूटर संरचना में संभव है। ऊर्ध्व गुणनफल, तिर्यक गुणनफल योग एवं अंतर विनकुलम, अंकीय आधारित योगफल जैसे माइक्रोओपरेशन अंकगणितीय एवं तर्क यूनिट (ALU) में जोड़े जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त नियमावली भी बनाई जा सकती है जिसके आधार पर पैटर्न मिलान करके माइक्रोओपरेशन किए जा सकते हैं।
अन्त में
इस आलेख में विषय प्रवेश का प्रयास किया गया है, प्रुफ देकर सूत्रानुसार एल्गोरिद्म प्रस्तावित किए गए हैं। अंक स्तर पर ऊर्ध्व, तिर्यक आदि से, गुणा-भाग समीकरण त्रिकोणमिति के कतिपय उदाहरण दिए गए हैं। पैटर्न मिलान और तदनुसार माइक्रोओपरेशन करने के लिए कंप्यूटर संरचना में ALU में व्यवस्था की जा सकती है। यह शोध का भी विषय है। वैदिक गणित में पैटर्न पहचान मिलान और सूत्र/उपसूत्र के अनुसार गणना करने से विद्यार्थियों में गणना-विकल्प खोज, रचनात्मकता और नवाचार प्रवृत्ति का विकास होगा।
संदर्भ
1. Swami Bharti Krishna Tirth, Vedic Mathematics, (BHU 1965), Motilal Banarasi Dass Publishers Pvt. Ltd.
2. M.L. Keedy, Number System: a modern introduction, Addison-Wesley Publication Company (1965)
3. N Puri, Ancient Vedic Mathematics, Pushp- 1, 2 & 3 (SSG, Roorkee, 1986, 1988, 1989)
Discover Vedic 4. Κ. Willianms, Mathematics (Lecture notes, 1990)
5. Om Vikas, et.al. "An Alternate Design for Paralled Multiplier", IETE Journal, August 2005.
संख्या सिद्धान्त
The Number Theory
राम शरण दास
Ram Sharan Dass
IV/49, वैशाली, गाजियाबाद 201010
rsgupta_248@yahpp.co.in
सारांश
राष्ट्रीय गणित वर्ष-2012 ने रामानुजन उन के योगदान और वह क्षेत्र जिसमें उन्होनें कार्य किया था, इन सबके विषय में रूचि और जिज्ञासा जगा दी है। रामानुजम् का सर्वाधिक विशिष्ट योगदान संख्या सिद्धांत के क्षेत्र में है। आप जानना चाहेंगे संख्या सिद्धान्त क्या है? संख्या सिद्धान्त की कुछ आधारभूत संकल्पनाओं से आपका परिचय इस लेख में कराया गया है।
ABSTRACT
National Mathematics year 2012 has aroused tremendous interest and curiosity about the contribution of Ramanujan and the fields he has worked in. Ramanujan has contributed the most in the field of number theory. Would you like to know what number theory is? Some basic concepts of number theory are introduced in this article
क्या है संख्या सिद्धान्त ?
संख्या सिद्धान्त में पूर्णांकों (.....3, 2, 1, 0, 1, 2, 3.....) के समुच्चय का अध्ययन किया जाता है। इसे उच्च अंक गणित भी कहते हैं: क्योंकि इसमें दैनंदिन जीवन में व्यवहार में लाई जाने वाली गणितीय संक्रियाओं (जोड़, घटा, गुण, भाग आदि) से आगे जाकर विभिन्न संख्या-प्रकारों के पारस्परिक संबंधों का अध्ययन किया जाता है।
संख्याओं के प्रकार
प्राचीन काल से ही प्राकृतिक संख्याओं को विभिन्न प्रकार के संख्या समूहों में बाँटा जाता रहा है। प्राकृतिक संख्याओं के कुछ प्रकार नीचे दिए गए हैं:
सम संख्याएं: वे संख्याएं जो दो से विभाजित हो जाती हैं, जैसे, 2, 4, 6, 8.....
विषम संख्याएं: वे संख्याएं जो दो से विभाजित नही की जा सकती, जैसे, 1, 3, 5, 7.....
वर्ग संख्याएं: जो प्राकृतिक संख्याओं का वर्ग हों, जैसे, 1, 4, 9, 16, 25.....
घन संख्याएं : जो प्राकृतिक संख्याओं का घन हों, जैसे, 1, 8, 27, 64, 125.....
अभाज्य संख्याएं : जो केवल स्वयं से और 1 से विभाजित हों, जैसे, 2, 3, 5, 7, 11.....
मिश्रित संख्याएं जिनके अभाज्य गुणनखण्ड रूप अन्य संख्याएं उपलब्ध हो यानि जो अभाज्य न हों, जैसे, 4, 6, 8, 9.....
1 (मॉड्यूलो 4) संख्याएं जिनको 4 से विभाजित करने पर । शेष रहे (जैसे, 1, 5, 9, 13, 17.....
3 (मॉड्यूलो 4) संख्याएं जिनको 4 से विभाजित करने पर 3 शेष रहे, जैसे, 3, 7, 11, 15.....
त्रिभुजीय संख्याएं जिन संख्याओं के बराबर
वस्तुओं को त्रिभुज रूप में रखा जा सके, जैसे: 1, 3, 6, 10, 15, 21.....
आदर्श संख्याएं : जिस संख्या के अपने अतिरिक्त अन्य सब गुणनखंडो का योग स्वयं उस संख्या के बराबर हो, जैसे, 6(1 + 2 + 3) 28(1 + 2, 4 + 7 + 14) 496.....
फिबोनाशी संख्याएं: संख्या अनुक्रम जिसमें पहली
दो संख्याएं 1. । हों तथा आगे की संख्याएं अपनी पूर्ववर्ती दो संख्याओं के योगफल के बराबर हों, जैसे 1, 1, 2, 3, 5, 8......
संख्या सिद्धान्त संबंधी स्वयंसिद्ध, अनुमान एवं प्रमेय
स्वयंसिद्ध एक मूलभूत कथन है जिसे स्वभावतः सत्य माना जाता है और जिसके लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। अनुमान संख्या क्रम के बीच एकसूत्रता की झलक है जो किसी कथन या सूत्र के रूप में प्रस्तुत की जाती है और जिसकी सभी संख्याओं के संबंध में उप्पत्ति अभी नहीं की जा सकी है।
प्रमेय एक ऐसा कथन है जो विचाराधीन रचनाक्रम के संदर्भ में स्वयंसिद्धों के आधार पर पूरे रचनाक्रम के लिए सही सिद्ध किया जा चुका है।
संख्या सिद्धान्त का इतिहास
संख्या सिद्धान्त संबंधी कार्य का सर्वाधिक प्राचीन लिखित प्रमाण एक टूटी हुई मृदा पट्टिका 'टिलम्पटन 322 deg है जिस पर पाइथागोरियन त्रिकों अर्थात् ऐसे पूर्णाकों a, b, c की सूची है जो संबंध a ^ 2 + b ^ 2 = c ^ 2 द्व ारा परस्पर संबंधित हैं। पट्टिका 1800 ई. पूर्व की मेसोपोटामिया की बाबिलोनियाई संस्कृति का अवशेष है और इस पर इतने अधिक त्रिक उत्कीर्णित हैं कि वे किसी अव्यवस्थित प्राकृतिक बल का परिणाम नहीं हो सकते।
बेबिलोनवासियों से थेल्स और पाइथागोरस द्वारा संख्या सिद्धान्त यूक्लिड तक पहुँचा जहाँ क्रमबद्ध संख्या सिद्धान्त के कुछ प्राथमिक प्रमेय देखने को मिलते हैं, जैसे : 'सम और विषम संख्या का गुणनफल सम होता है', "यदि कोई विषम संख्या किसी सम संख्या को पूर्णतः विभाजित कर सकती है तो वह इसके आधे को भी पूर्णतः विभाजित कर सकती है, आदि।
पाइथोगोरियाई परम्परा में बहुभुजीय और चित्रात्मक संख्याओं जैसे वर्ग, घन संख्या आदि का भी उल्लेख है। इनमें त्रिभुजीय और पंचभुजीय संख्याओं के ऊपर तो कार्य 17वीं शताब्दी में ही शुरू हो पाया।
यूनान में संख्या सिद्धान्त पर सर्वधिक महत्वपूर्ण कार्य संभवतः अलेक्जेन्ड्रिया के डायोफेन्टस का था, जिनके 'अरिथमेटिका' के 13 खंडों में से 6 मूल यूनानी में और इनके अतिरिक्त अन्य चार अरबी अनुवाद हैं। 'अरिथमेटिका' में बहुपद समीकरणों की सहायता से हल किए जा सकने वाली समस्याओं का साधित संकलन है।
भारत में आर्यभट्ट, ब्रहमगुप्त, जयदेव और भास्कराचार्य ने स्वतंत्र रूप से संख्या सिद्धान्त के कई पक्षों पर कार्य किया परन्तु पश्चिम को अठारहवी शताब्दी तक उसका ज्ञान नहीं हो पाया।
आधुनिक संख्या सिद्धान्त की शुरूआत सतरहवी शताब्दी में फार्मेट से होती है और बाद में यूलर, गोल्डबैंक, लाग्रांज, गाऊस, डिरिक्लेट, रीमैन, जैकोबी, क्रमर, कैन्टर, हिलबंद, हार्डी, रामानुजम और हरिश्चन्द्र आदि के कार्य ने संख्या सिद्धान्त को गणितीय अध्ययन के केन्द्र में ला दिया।
संख्या सिद्धान्त के स्वयंसिद्ध
पूर्ण संख्याओं, उनके पारस्परिक संबंधों और उनसे संबंधित संक्रियाओं के संबंध में कुछ आधार तथ्य जिनसे संख्या सिद्धान्त के प्रमेयों को सिद्ध किया जाता है इस प्रकार हैं:
किन्ही तीन पूर्णाकों के लिए
1. गुणा एवं समाकलन पर संवृत्ति (closure): अर्थात् यह तथ्य कि ab एवं a + b एवं भी पूर्णांक होंगे।
2. गुणा की एवं समाकलन की क्रम विनिमेयता (commutativity): अर्थात्
ab = ba
एवं a + b = b + a
3. गुणा की एवं समाकलन की सहचारिता (Associativity): अर्थात्
(axb) x cax (bxc) = axbx c एवं (a+b)+c=a+(b+c)=a+b+c
4. वितरणशीलता (Distributiliy): अर्थात् ax (b+c)=axb+axc
5. त्रिविभाज्यता (Trichotomy): a < 0 a = 0 अथवा a > 0
6. सु-क्रमित सिद्धान्त (Well Ordered Principle): धन पूर्णाकों के किसी अ-रिक्त समुच्चय में एक घटक न्यूनतम होगा।
7. न-नगण्यता (Non-Triviality): 01
8. अस्तित्त्व (Existence) । एक पूर्णांक है।
संख्या सिद्धान्त के कुछ प्रसिद्ध अनुमान (Conjectures)
संख्याओं की प्रकृति और उनके पारस्परिक संबंधों को व्यक्त करने वाले अनुमानों की सूची लम्बी है। इनमें से कुछ प्रसिद्ध अनुमानों का उल्लेख नीचे किया गया है। ये सभी अनुमान डियोफैन्टाइन गणित अर्थात् उस तरह के बीजगणितीय समीकरणों से संबंधित है जिनमें अनेक चर सम्मिलित होते हैं और जिनके हल के रूप में परिमेय संख्याएं प्राप्त होती हैं।
1. एबीसी अनुमान (ABC Conjecture)
ABC अनुमान संख्या सिद्धान्त का एक व्यापक अनुमान है जिसने अनेक नए अनुमानों की आधारभूमि तैयार की और पुराने अनुमानों को समझने में सहायता की। इस अनुमान में वर्ग-मुक्त संख्याओं की अवधारण ॥ अर्थात् ऐसे पूर्णाकों की बात की गई है, जो किसी संख्या के वर्ग से विभाजित नहीं होते। इसे यदि sqp(x) से व्यक्त करें तो
sqp(15), sqp(16) 24 = 2 तथा
sqp(1400) = sqp(23 x 52 x 7) = 2 x 5 x 7 = 70 होगा।
इस अनुमान के अनुसार यदि आप कोई संख्या ∈ > 0 लें तो तीन पूर्णाक A, B और C ऐसे पाए जा सकते हैं कि A+B = C हो और [sqp(A - BC)]/C < ∈ हो। C < 10 ^ 18 तक के लिए इस अनुमान की पुष्टि की जा चुकी है किन्तु इसका कोई गणितीय प्रमाण अभी तक नहीं दिया जा सका है।
2. गोल्डबैक का अनुमान (Goldbach's Conjecture)
"दो से बडी प्रत्येक सम संख्या को दो अभाज्य संख्याओं के योग के रूप में व्यक्त किया जा सकता है।" इस अनुमान की पुष्टि 4 * 10 ^ 18 तक सभी सम-संख्याओं के लिए की जा चुकी है परन्तु गणितीय प्रमाण की प्रतीक्षा है।
उदाहरण: 10-3+7 100 = 3 + 97 = 11 + 89 = 17 + 83 = 29 + 71 =41+ 59-47+53
3. जुडवाँ अभाज्य संख्याओं संबंधी अनुमान
है।" "जुडवां अभाज्य संख्याओं की संख्या अनन्त होती
जुडवाँ अभाज्य संख्याएं वे अभाज्य संख्याएं हैं जिनके बीच अन्तर दो हो इस प्रकार (3, 5), (5, 7), (11, 13) आदि जुडवाँ अभाज्य संख्याएं हैं।
4. बील का अनुमान
"यदि A + B = C हो, जहाँ A, B, C धन पूर्णाक हैं और x, y, z के मान 2 से अधिक है, तो A, B, C में एक सर्वनिष्ठ अभाज्य गुणक होना चाहिए।" इस अनुमान को सिद्ध करने के लिए एण्डी बील ने 10 लाख डॉलर का पुरस्कार घोषित किया हुआ है।
5. कॉलेज का अनुमान
"कोई भी प्राकृतिक संख्या लें, यदि यह सम संख्या हैं तो दो से भाग करके और विषम संख्या हो तो सीधे ही इसे 3 से गुणा करके इसमे 1 जोड़ें। प्राप्त संख्या पर यही क्रम चलाएं और बार-बार यह संक्रिया दोहराते रहें तो चाहे आप किसी भी संख्या से शुरू करें अंत में आपको परिणाम में सदैव 1 ही प्राप्त होगा।"
गणितीय अनुमानों की पुष्टि समय बिताने की एक अच्छी युक्ति है और इनको प्रमाणित करना एक बड़ी गणितीय उपलब्धि।
संख्या सिद्धान्त के कुछ प्रसिद्ध प्रमेय
1. लाग्रांज का चार वर्गों का प्रमेय
"किसी भी प्राकृतिक संख्या को चार पूर्णांक वर्गों
के योग के रूप में लिखा जा सकता है।
अर्थात् P = a_{0} ^ 2 + a_{1} ^ 1 + a_{2} ^ 2 + a_{3} ^ 2 उदाहरण : 310 = 17 ^ 2 + 4 ^ 2 + 2 ^ 2 + 1 ^ 2
2. अंकगणित का मूलभूत प्रमेय :
1 से बड़ा कोई भी पूर्णाक या तो अभाज्य संख्या होगी या फिर अभाज्य संख्याओं का गुणनफल। यदि संख्या भाज्य है तो उसके अभाज्य गुणनखण्ड अनन्य होते हैं लिखने में केवल उनका क्रम परिवर्तित हो सकता है स्वयं गुणनखंड परिवर्तित नहीं हो सकते।
उदाहरण: 70 = 2 * 5 * 7
प्रमेय के अनुसार 70 के 2,5,7 के अतिरिक्त अन्य कोई अभाज्य गुणनखण्ड नहीं हो सकते।
3. फर्मेट का लघु प्रमेय
यदि P कोई अभाज्य संख्या हो और a कोई पूर्ण संख्या हो तो (ap-a) को P से पूर्णतः विभाजित किया जा सकेगा।
उदाहरण: यदि P = 5 और 2 लें, तो 2 ^ 5 - 2 = 32-2-30 स्पष्टतः यह संख्या (30) 5 से भाज्य है।
4. युक्लिड का अभाज्य संख्याओं की अनन्तता संबंधी प्रमेय
यूक्लिड नें सिद्ध किया कि अभाज्य संख्याओं की संख्या अनन्त होती है।
5. ऑयलर का प्रमेय :
यदि । कोई धन अभाज्य पूर्णांक है और n >= 1 है तो n से कम ऐसे सभी पूर्णांको की संख्या जो n की असहभाज्य संख्याएँ हों, (n-1) होती है। किसी संख्या a की असहभाज्य संख्या b ऐसी संख्या है जिनके बीच 1 के अतिरिक्त कोई अन्य संख्या समान गुणनखण्ड के रूप में विद्यमान न हो। इन n-1 संख्याओं का (फाई) समुच्चय ऑयलर का टोटिएंट फलन या फलन कहलाता है।
अतः यूलर के प्रमेय के अनुसार phi(n) = (n - 1)
इस प्रकार :
phi(2) = 1
phi(3) = 2, \{1, 2\}
phi(5) = 4, \{1, 2, 3, 4\}
b(7) = 6, \{1, 2, 3, 4, 5, 6\}
(11) = 10, \{1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10\}
जैसे : भाज्य संख्याओं के लिए यह प्रमेय लागू नहीं होगा phi(4) = 2, \{1, 3\}
phi(6) = 2, \{1, 5\} इस प्रकार यह प्रमेय अभाज्य संख्याओं को पहचानने में सहायता करता है।
भारत के सुप्रसिद्ध गणितज्ञ एवं ज्योतिषी आर्यभट्ट त्रिकोणमिति के आविष्कर्ता थे। उनके ग्रंथ 'आर्यभट्टीय' में त्रिकोणमिति का पहली बार उल्लेख किया गया है।
गणित में अनन्त की अवधारणा
Concedpt of Infinity in Mathematics
राम शरण दास
Ram Sharan Dass
IV/49, वैशाली, गाजियाबाद 201010
rsgupta_248@yahpp.co.in
सारांश
गणित में अनन्त की अवधारणा अत्यन्त विशिष्ट और अनन्य है। न यह कोई संख्या हे न अंक फिर भी किसी भी प्रकार का चिंतन प्रतिमान इसके बिना अधूरा है। यह एक रहस्यमयी अवधारणा रही है। अनन्त के गणितीय चिन्तन को स्पष्टता के साथ ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया गया है। कुछ उदाहरणों के द्वारा यह समझाने का प्रयास भी किया गया है कि व्यवहारिक स्थितियों में इसका उपयोग कैसे किया जाता है।
ABSTRACT
The concept of mathematics has a very special and unique position in mathematics. It is neither a number nor a digit even then no thinking paradigm is complete without it. It has remained a mysterious historical perspective. How this concept is used in practical situations is also explained with the help of some examples.
अनन्त अर्थात् एक ऐसा सत्व जिसका कोई अन्त न हो, छोर न हो, पूर्णता न हो, समापन न हो युगों से चिंतकों को अपनी ओर आकर्षित करता रहा है। चिन्तन का विषय कुछ भी हो, परन्तु उस विषय में अनन्त के अस्तित्व की अवधारणा की आवश्यकता अनिवार्य लगती है। गणित में अनेक संदर्भों में अनन्त की अवधारणा उभरती है, जैसे किसी रेखा पर ज्योमितीय बिन्दुओं की कुल संख्या अनन्त होती है आदि-आदि।
भास्कराचार्य ने शून्य और अनन्त के रिश्ते की बात की है और अनन्त को 'ष' हर अर्थात् एक ऐसी संख्या के रूप में परिभाषित किया है जो किसी भी संख्या को शून्य से विभाजित करने पर प्राप्त होती है। अन्य अंको की तरह अनन्त के लिए भी एक प्रतीक निर्धारित है: यह अंग्रेजी के अंक आठ के प्रतीक (8) को क्षैतिजतः लिटाने से ∞ प्राप्त होता है: । यह प्रतीक 1655 में जोहन वालिस द्वारा पहले पहल सुझाया गया था। भास्कराचार्य की परिभाषा को अब आप इस प्रकार लिख सकते हैं कि x/0=∞ जहाँ x शून्य के अतिरिक्त कोई वास्तविक संख्या है।
क्या है अनन्त ?
अनन्त एक रहस्यमयी संख्या है। इसका अस्तित्व केवल एक विचार के रूप में है। बड़ी से बड़ी संख्या को भी आप अनन्त नहीं कह सकते। न ब्रह्माण्ड के तारों की संख्या को अनन्त कहा जा सकता है और न ब्रह्माण्ड में कणों की संख्या को। किसी भी वास्तविक संख्या को अनन्त नहीं कहा जा सकता। +∞ बड़ी से बड़ी वास्तविक संख्या से बड़ा है और –∞ छोटी से छोटी वास्तविक संख्या से छोटा है। यह जटिल नहीं है, सरल है, परन्तु इसका कोई कल्पना चित्र नहीं बनाया जा सकता है। अलग-अलग संदर्भ में इसका अलग अर्थ हो सकता है।
अनन्त के गुण
अनन्त कोई भौतिक रूप की संख्या नहीं है, यह एक संकल्पना है। गणित में जब इसे संख्या के रूप में उपयोग में लाया जाता है तो यह ऐसा गणितीय मान होता है जो एक सीमा की ओर बढ़ने पर प्राप्त हो सकता है अर्थात् जब a का मान शून्य के करीब बढ़ रहा हो तो x को a से विभाजित करने पर प्राप्त मान अनन्त के करीब बढ़ता जाता है। अर्थात्, जब तो x/a –>∞
अनन्त के साथ विभिन्न गणितीय संक्रियाएं
1. अनन्त में कोई भी वास्तविक संख्या जोड़ने या घटाने से प्राप्त फल अनन्त ही होता है। यहाँ तक कि अनन्त को अनन्त में जोड़ने से भी योगफल अनन्त ही होता है तथापि अनन्त में से अनन्त को घटाने से शेषफल एक अपरिमित संख्या होती है। इस गुण का एक निहितार्थ यह भी है कि अनन्त का अंश पूर्ण के बराबर हो सकता है। परन्तु दो अनन्त एक दूसरे के बराबर नहीं भी हो सकते हैं।
2. अनन्त में किसी भी प्राकृतिक संख्या द्वारा गुणा या भाग करने पर प्राप्त फल अनन्त होता है, अनन्त को अनन्त से गुणा करने पर गुणनफल अनन्त होता है परन्तु अनन्त को अनन्त से भाग करने पर भागफल अपरिमित होता है।
3. शून्य के साथ अनन्त का विशेष रिश्ता है। दार्शनिक दृष्टि से कहें तो सृष्टि का उद्भव शून्य से होता है और उसका लय अनन्त में होता है और गणित की दृष्टि से कहे तो किसी संख्या को अनन्त से विभाजित करें तो वह शून्य हो जाती है और किसी संख्या को शून्य से विभाजित करे तो वह अनन्त हो जाती है। तथा 0 × ∞, (∞)/(∞), ∞°, 0/0 तथा 0° अपरिभाषित या अपरिमित कहे जाते हैं।
अनन्त से जुड़े विरोधाभास तथा आधुनिक गणित का विकास
अपने अनन्य गुणों के कारण अनन्त की अवधारण ॥ चिन्तन को बहुत उलझाती है और अनेक विरोधाभासों को जन्म देती है। शान्त चिन्तन के लिए अभ्यस्त मानव मस्तिष्क अनन्त तक पहुँच नहीं पाता है और त्रुटिपूर्ण निष्कर्षों पर पहुँचता है। यह क्रम हजारों वर्षों से चल रहा है, विरोधाभासी तर्क प्रस्तुत किए जाते हैं, उनके समाधान मे नए सिद्धांत जन्म लेते हैं और फिर नए प्रश्न खड़े होते हैं। अनन्त ने तर्क, दर्शन, विज्ञान और गणित के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। अनन्त से जुड़े कुछ विरोधाभासों की चर्चा नीचे की गई है:
1. जेनों के विरोधाभास
यूनान में ईलियाई दार्शनिक जेनों ने चार स्थितियाँ प्रस्तुत कर और अनन्त का सहारा लेकर दर्शाया कि चाहे आप दिक्काल को पाइथागोरस की तरह विविक्त ईकाईयों से निर्मित माने या हिप्पासस और थियोडोरस की तरह सातत्यपूर्ण, तर्क हमें सामान्य अनुभव के विपरीत निष्कर्षों पर ले जाते हैं। जेनों के यह विरोधाभास कुछ इस प्रकार हैं:
★ किसी रेखा को खण्ड-खण्ड करते जाएं तो अन्त में बिन्दु प्राप्त होता है, जिसका कोई आमाप नहीं है तो फिर आमापहीन बिन्दु से बनी रेखा में लम्बाई कहाँ से आती है? शून्य में शून्य को चाहे जितनी बार भी जोड़ें परिमाण आखिर शून्य ही तो रहना चाहिए।
★ यदि दूरी बिन्दुओं से और काल क्षणों से निर्मित मान लें तो फिर यह निष्कर्ष निकलेगा कि किसी भी प्रकार की गति सिर्फ नजरों का धोखा है। जेनों ने गति के विरूद्ध चार तर्क दिए द्विभाजन, वाण, कछुए और खरगोश की दौड़ तथा स्टेट।
★ द्विभाजन दर्शाता है कि दूरी सतत् नहीं हो सकती। क्योंकि यदि किसी व्यक्ति को बिन्दु A से बिन्दु B तक जाना है तो पहले वह AB/2 दूरी चलेगा, पर उससे पहले AB/4 दूरी चलनी होगी और फिर AB/8 दूरी चलनी होगी और इस प्रकार अनन्त चरण चलकर वह B तक पहुँचेगा। तब अनन्त चरण चलने में उसे समय भी तो अनन्त लगना चाहिए। अर्थात् A से चल कर B तक व्यक्ति कभी नहीं पहुँचेगा। इसी प्रकार के तर्क अन्य स्थितियों के लिए भी दिए गए।
2. गैलिलियो के विरोधाभास
गैलिलियो गैलिली ने 1638 में संख्या विश्लेषण करते हुए कुछ विरोधाभासों की ओर इंगित कियाः यदि एक के संगत एक रख कर तुलना करें तो सम संख्याओं का समुच्चय विषम संख्याओं के समुच्चय के बराबर होगा और ये दोनों समुच्चय मिलकर भी प्राकृतिक संख्याओं के समुच्चय के बराबर होंगे और अलग-अलग भी इसकी संख्या बराबर होगी।
ऐसा कैसे? वास्तव में गैलिलियों ने पूर्ण वर्ग संख्याओं के संदर्भ में इस विरोधाभास का संकेत दियाः
"पूर्ण वर्ग संख्याओं की संख्या कुल प्राकृतिक संख्याओं से अधिक होती है।"
3. सतत दशमलव भिन्नों से जुड़े विरोधाभास
यदि किसी भिन्न के हर यानि डिनोमिनेटर के गुणनखण्डों में 2 और 5 के अतिरिक्त कोई अन्य अभाज्य संख्या आए तो उसकी दशमलव अभिव्यक्ति असामान्य होगी दशमलव के बाद अंकों का क्रम उसमें अनंत तक चलेगा और अंक या तो बार-बार दोहराए जाऐंगे या नहीं दोहराए जायेंगे।
उदाहरणार्थ : 1/9 = 0.1111...
यदि हम इस समीकरण को दोनों ओर 9 से गुणा करें तो
1 = 0.9999 = 0.9'
अब चाहे कितना भी सूक्ष्म अन्तर हो परन्तु 1 और 0.9' में अन्तर तो मालूम पड़ता ही है।
अनन्त की विचित्रताओं में आधुनिक गणित के श्रेष्ठतम मस्तिष्क लम्बे समय तक उलझे रहे और अभी भी उलझे हैं इनमें कुछ प्रमुख नाम हैं: जॉर्ज केन्टर, डेबिड हिल्बर्ट, रीमेन, गाऊस, रामानुजन आदि।
अनन्त के संदर्भ में अंश यानि न्यूमरेटर पूर्ण के बराबर कैसे होता है इसको समझाने के लिए हिल्बर्ट ने अपने एक भाषण में एक होटल का उदाहरण दिया जो यह दर्शाता है कि कैसे अनन्त के गुण परिमित संख्याओं से भिन्न होते हैं: मान लीजिए कि एक होटल है जिसमें कमरों की संख्या परिमित है और सभी कमरों में यात्री ठहरे हैं तो एक नए यात्री के आने पर होटल मैनेजर को कहना पड़ेगा कि माफ कीजिए, कोई कमरा खाली नहीं है। परन्तु यदि कोई होटल ऐसा हो कि उसमें अनन्त कमरे हों और सभी कमरों के यात्री को अगले कमरे में स्थानान्तरित करके यह मैनेजर नए यात्री के लिए स्थान बना सकता है।
अनन्त के उपयोग
1. सभी अबीजी अपरिमेय संख्याओं को न दोहराई जाने वाली अनन्त दशमलव भिन्न के रूप में लिखा जाता है, जैसे
π = 3.141592653589793 ....
हमें जितने अंकों तक यथार्थता की आवश्यकता हो, उतने अंकों तक इनको पूर्ण करके उपयोग में लाया जा सकता है। आज जब परिशुद्ध गणनाओं के लिए अत्यन्त शुद्ध मानों की आवश्यकता पड़ने लगी है, इन राशियों के मान दशमलव के हजारों अंकों तक शुद्ध ज्ञात होना आवश्यक हो जाता है। इतने शुद्ध मान याद रखने के लिए या तो पद्यात्मक सूत्र रचे गए या गणितीय समीकरण * बनाई गई। संस्कृत में अंकों के लिए अक्षर निर्धारित कर उनका उपयोग कर बहुअर्थी श्लोक लिखे गए। ऐसा एक श्लोक भारती कृष्ण तीर्थ जी महाराज ने वैदिक गणित में उद्धृत किया है जो π / 10 का मान 32 दशमलव अंकों तक सही-सही बताता है।
गोपीभाग्यमनुव्रात-श्रृडिःशोदधिसन्धिग।
खल जीवितखाताब गलहालार संधर।।
साथ में दिए अक्षरकूट का उपयोग कर आप स्वयं देख सकते है कि इस श्लोक से π / 10 का मान 0.31415926535897932384626433832792 आता है, जो इसका 32 अंकों तक सही मान है। किन्तु ये तो केवल याद रखने में मदद करने वाली युक्तियाँ हैं। गणितज्ञ तो संख्याओं के संबंधों में रूचि रखते हैं और उन संबंधों को व्यक्त करने वाले सूत्र तलाशते हैं। अनेक वैज्ञानिकों ने समय-समय पर के मान के लिए अनेक संतत भिन्न सुभाए। इनमें से हमने यहाँ दो का उल्लेख किया है, जो कि साथ के बॉक्स में दिये गये हैं।
रामानुजन का सूत्र देखने में दुरूह मालूम पड़ता है परन्तु इसके प्रत्येक बार के योग से के 8 दशमलव अंक आगे तक के मान प्राप्त हो जाते हैं, सुपर कम्प्यूटर का इस्तेमाल करके अब इस सूत्र द्वारा का मान दशमलव के अरबों अंकों तक शुद्ध प्राप्त किया जा चुका है।
2. वास्तविक परिमेय भिन्नों में यदि हर के अभाज्य गुणनखण्डों में 1, 2, 5 के अतिरिक्त कोई और संख्या आए तो इस भिन्न की दशमलव अभिव्यक्ति में दशमलव के बाद अनन्त अंक आयेंगे, परन्तु इनमें अंकों का एक समुच्चय बार-बार दोहराया जाएगा।
जैसे 1/3 = 0.3333...
ऐसी अनन्त दशमलब भिन्न को यदि साधारण भिन्न में व्यक्त करना हो तो अनन्त के गुणों का उपयोग करना होगा।
इसके लिए मान लिखिए कि x = 0.3' = 0.33' ......... (1)
दोनों तरफ 10 का गुणा करने पर,
10x=3.3' ......... (2)
समीकरण (2) में से समीकरण (1) घटाने पर हमें मिलता है 9x = 3
इसका मतलब, x = 3/9 = 1/3
3. गणितीय परिकलनों में ऐसी अनेक स्थितियाँ आती हैं जहाँ अनन्त पदों की श्रेणी का योग करने पर कोई परिमित राशि प्राप्त हो जाती है। वहाँ अनन्त के गुणों को उपयोग करके वह राशि प्राप्त की जाती है। स्पष्ट है ऐसी अनन्त श्रेणी एक अभिसारी श्रेणी होती है। नीचे एक अभिसारी श्रेणी और उसके हल की विधि दर्शाई गई है:
s= 1 + 1/2 + 1/4 + 1/8 +......
इसे 2 से भाग देने पर निम्नलिखित श्रेणी प्राप्त होगी।
होगी।
s/2 = 1/2 + 1/4 + 1/8 +.......
अब 5 में से वाली श्रेणी को घटाने पर हमें s/2 मिलता है यानि s – s/2 = 1 यानी s/2 = 1
अतः s = 2
4. आइए, इस प्रकार की एक व्यवहारिक स्थिति पर विचार करते हैं। मान लीजिए कि प्रतिरोधों (r) का एक अनन्त नेटवर्क नीचे दिए अनुसार है:
इस नेटवर्क का कुल प्रतिरोध यदि R हो तो इसमें से एक कड़ी अलग कर लेने पर शेष बचे नेटवर्क का प्रतिरोध भी अनन्त के गुणों के आधार पर R ही होगा। तब हम उपरोक्त परिपथ के समतुल्य परिमित परिपथ निम्न प्रकार बना सकते हैं:
अब आगे इसे भौतिकी एवं गणित के अन्य नियमों का उपयोग कर हल किया जा सकता है।
5. साधारण गणितीय संक्रियाएं जब अनन्त के लिए उपयोग में लाई जाती हैं तो अनेक विरोधाभासों को जन्म देती हैं। उदाहरण के लिए यदि हम सभी पूर्णाकों का योग करें तो नीचे दिखाई गई तीन अलग-अलग स्थितियाँ मिलती हैं:
ऊपर वर्णित अनन्त का विवरण तो इसका एक परिचय मात्र है, जैसे-जैसे आप इसे जानेंगे इसके जादुई प्रभावों से अभिभूत होते जायेंगे।
क्या आप जानते हैं?
सत्येंद्रनाथ बोस एक मात्र भारतीय भौतिक विद हैं, जिनका नाम आइंस्टीन के साथ सम्बद्ध है। आइंस्टीन ने बोस की प्रतिभा को पहचाना और स्वयं वैज्ञानिक जगत को इस बात से अवगत कराया। सत्येंद्रनाथ बोस के अनुसंधान कार्य और फर्मी द्वारा किए गए विकास से ही नाभिकीय भौतिकी के परमाणु कणों को दो भागों में विभिक्त करना संभव हुआ है। इन्हीं को बोस के नाम पर 'बोसोन' तथा फर्मी के नाम पर 'फर्मियोन' कहा गया है।
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